अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।
गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥2॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७३२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१४
समय पर शौर्य,शक्ति को प्रकट करें
जीवन के तत्त्व, जीवन के सत्य, कन्या भाव, ब्रह्मचर्य आदि से नयी पीढ़ी को अवगत कराएं
प्रातःकाल की ये सदाचार वेलाएं अद्भुत हैं आनन्द के इन क्षणों में सुनने को मिलने वाले सदाचारपूर्ण विचार मन को शुद्ध कर देते हैं और पूरे दिन के लिए नई ऊर्जा, प्रेरणा एवं सकारात्मकता प्रदान करते हैं तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में
आजकल हम किष्किन्धा कांड के प्रसंगों को सुनकर भावविभोर हो रहे हैं
किष्किन्धा कांड वास्तव में अद्भुत है, क्योंकि यह केवल कथा का एक चरण नहीं, बल्कि जीवन के अनेक गूढ़ सिद्धांतों का सजीव दर्शन कराता है। इसमें भगवान् राम का वनवासी जीवन मित्रता, नीति, धैर्य और कर्तव्य के साथ एक नए मोड़ पर आता है।
इस कांड में भगवान् राम और सुग्रीव की भेंट होती है। दोनों अपने-अपने दुःख से पीड़ित हैं— भगवान् राम मां सीता की खोज में हैं तो सुग्रीव अपने भाई बालि के भय से वन में भटक रहे हैं। यहाँ यह संदेश मिलता है कि समान पीड़ा वाले व्यक्ति सहज ही एक-दूसरे के सच्चे मित्र बन जाते हैं। भगवान् राम और सुग्रीव की मित्रता केवल स्वार्थ पर आधारित नहीं है, बल्कि विश्वास, सहयोग और धर्म पर आधारित है।
हनुमान जी
(“रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।”)
का प्रथम दर्शन भी इसी कांड में होता है। वे भगवान् राम के प्रति अपनी बुद्धि, विनम्रता और सेवा भाव से तुरंत जुड़ जाते हैं। यह यह दर्शाता है कि सच्चा सेवक वही है जो अपने स्वामी को पहचानकर पूर्ण समर्पण से कार्य करे।
बालि और सुग्रीव का प्रसंग नीति और धर्म का गहन विवेचन प्रस्तुत करता है।
जब बालि ने सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया, तब उसने सुग्रीव की पत्नी रूमा को भी अपने अधिकार में रख लिया। यही एक बड़ा अधर्म था, क्योंकि छोटे भाई की पत्नी को अपनी पुत्री के समान मानना चाहिए। इसी अन्याय के कारण भगवान् राम बालि का वध कर देते हैं
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥4॥
भगवान् राम ने कहा- हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता है
इस चौपाई का मूल उद्देश्य समाज में स्त्री के प्रति शुद्ध दृष्टि और मर्यादित व्यवहार स्थापित करना है। यहाँ “कन्या समान” कहकर यह बताया गया है कि स्त्री को भोग की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण के योग्य समझना चाहिए। यह केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से यह सिखाता है कि हर स्त्री के प्रति मन, वचन और कर्म से पवित्रता रखनी चाहिए।
“कुदृष्टि” केवल शारीरिक दृष्टि नहीं है, बल्कि मन में उठने वाले विकृत विचार भी इसमें आते हैं। इस प्रकार यह चौपाई मनुष्य को अपने भीतर के संस्कारों को शुद्ध रखने की शिक्षा देती है। समाज की स्थिरता, विश्वास और पवित्रता इसी पर आधारित होती है कि पुरुष अपनी दृष्टि और आचरण को संयमित रखे।
अन्ततः यह संदेश केवल दण्ड की बात नहीं करता, बल्कि चेतावनी देता है कि यदि मनुष्य अपनी दृष्टि को नियंत्रित नहीं करेगा, तो उसका पतन निश्चित है।
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