28.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३३ वां* सार

 राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥10॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१५

संपूर्ण भारत में स्थान स्थान पर हमें शक्ति भक्ति विचार विश्वास का प्रयोग करना होगा 

हम स्वयं जागें और दूसरों को भी जाग्रत करें तभी राष्ट्र सच में सशक्त और जीवंत बनेगा 



साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में कथा को अद्भुत रूप से एक सूत्र  में पिरोया है जहाँ सिद्धान्त  और व्यवहार  साथ-साथ चलते हैं।किष्किन्धा काण्ड के इस प्रसंग में, जब इन्द्रावतार बालि का वध हो चुका है, तब कथा केवल एक युद्ध या न्याय की घटना नहीं रह जाती, बल्कि संसार और असंसार (माया और वैराग्य) की गहन चर्चा का माध्यम बन जाती है।

बालि की मृत्यु केवल एक वीर का पतन नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति और भोगप्रधान जीवन के अंत का संकेत है। बालि अत्यन्त शक्तिशाली था, परंतु उसका जीवन संसार में अत्यधिक आसक्ति (राज्य, बल, प्रतिष्ठा) से बंधा हुआ था। इसलिए उसकी मृत्यु हमें यह सिखाती है कि चाहे कितना भी बल या वैभव हो, यदि जीवन केवल संसार में उलझा है, तो उसका अंत निश्चित है।

इसके विपरीत, इसी प्रसंग में सूर्यावतार सुग्रीव का चरित्र सामने आता है। सुग्रीव भी पहले भय और मोह में था, लेकिन  भगवान् राम के संपर्क में आकर उसका जीवन असंसार की ओर मुड़ता है । एक और अद्भुत चरित्र है तारा 


तारा का चरित्र श्री रामचरितमानस में कई स्तरों पर चमकता है। वह केवल बाली की पत्नी नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी, नीति-निपुण और आध्यात्मिक रूप से जाग्रत नारी है बाली की मृत्यु के बाद तारा विलाप में डूबकर असंतुलित नहीं होती, बल्कि उसी क्षण भगवान् राम के स्वरूप को पहचानकर उनसे भक्ति का वर माँगती है


तारा का जीवन जटिल परिस्थितियों से भरा था, फिर भी उसने विवेक, मर्यादा और भक्ति को नहीं छोड़ा इसीलिए वह पंचकन्या में स्थान पाती है।


अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।

जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥

यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।

गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥2॥


तारा कहती है 

हे नाथ! अब कृपा करके मेरी ओर देखिए और मुझे वह वरदान दीजिए जो मैं माँग रही हूँ। मैं जिस-जिस योनि में कर्मवश जन्म लूँ, वहाँ-वहाँ मेरे हृदय में आपके चरणों के प्रति प्रेम बना रहे।

यह मेरा पुत्र अंगद विनय, बल और गुणों में मुझसे भी बढ़कर है, अतः हे कल्याण देने वाले प्रभु! इसे स्वीकार कीजिए। इसकी भुजा पकड़कर आप इसे अपना दास बना लीजिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कथा के विस्तार में और क्या बताया , क्या भक्ति केवल घंटी बजाना है, भैया अखिल तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें