हमने पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब परिवार कहा
दुनिया ने जिसको ठुकराया आगे बढ़ उसका हाथ गहा
हम जीव मात्र को सदा दया का द्वार दिखाते आए हैं
परहित में अपना तन मन धन घर-बार लुटाते आए हैं
अपने जैसा सबको माना जो कुछ दुनिया में दृश्यमान ॥ १ ॥
भारत महान् भारत महान्....
तब इस महान् भारत ने अपने इतिहास में दुर्दशा के कई काल क्यों देखे यह एक गम्भीर चिन्तन का विषय है..
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७३४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१६
अपने भीतर निहित शक्तियों की अनुभूति करें
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्
अपने भावों को जाग्रत करने के लिए मानस आदि का अध्ययन करें
तुलसीदास जी का चिन्तन अद्भुत है ऐसा कहा जाता है कि वाल्मीकि ही तुलसीदास बनकर आये भारत का ऐसा अवतारत्व हमें असीमित रूप से संबल प्रदान करता है
इसी संबल को लेकर कवि कहता है
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥
जब जब होई... कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब.... धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
श्रीरामचरितमानस की रचना तुलसीदास जी ने अत्यन्त विषम परिवेश में की उस समय भारत में दुष्ट अकबर का शासन था। भारत की अस्मिता पर प्रहार हो रहा था l सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनेक चुनौतियाँ थीं। ऐसे दौर में तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस के माध्यम से सनातन धर्म, भक्ति और नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित कर भारतीय समाज को एकता और संगठन का संदेश दिया।
वर्तमान परिस्थितियां भी अत्यन्त विकट हैं हमें इस ओर ध्यान देना होगा हम खाने और सोने के लिए पैदा नहीं हुए हैं अपने कर्तव्य को समझें
अपने आत्मस्थ तत्त्व का दर्शन करें
डा जी एन वाजपेयी के पास कौन संत आये थे, मां सीता के निर्वासन की चर्चा क्यों हुई माया का पर्दा कैसे हटता है जानने के लिए सुनें