28.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६३ वां* सार -संक्षेप

 बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥

रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥


रामकथा बुद्धिमानों को शान्ति, सामान्य जनों को आनन्द, कलियुग के पापों से मुक्ति और अन्तःकरण में विवेक की ज्योति प्रदान करती है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष  द्वादशी /त्रयोदशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४५

जिस प्रकार हनुमान जी को विश्वास था 


ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।

तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥

वैसा ही विश्वास हम लोगों के भीतर भी उत्पन्न हो इसका प्रयास करें 


जो कुछ जहां भी जो भी देशहित कर रहा 

करता रहे सदा ही पूरे मनोयोग से

कर्म का कुठार दायें हाथ में पकड़कर 

बायें को लगाए रहे नवल प्रयोग से

कर्मयज्ञ सतत चला है चलता रहेगा 

किसी भी दशा दिशा में योग में वियोग में 

अतः मलिन मन होकर न बैठो मित्र 

मन को लगाए रहो सदा कर्मयोग में ll 


हममें से जो भी राष्ट्रहित में कार्य कर रहा हो , उसे पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ  करता रहे l कर्म में परिश्रम  के साथ नवल प्रयोग भी कर सकते हैं जीवन में संयोग-वियोग, अनुकूलता-प्रतिकूलता आती रहती हैं, परन्तु कर्मरूपी यज्ञ कभी रुकना नहीं चाहिए। इसलिए निराशा , मालिन्य और निष्क्रियता धारण करके बैठने के स्थान पर मन को सदैव कर्मयोग में लगाकर उत्साहपूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए l जितने भी प्रयोग देशहित में होंगे वही रामकथा का आधार बनेंगे l 

रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥

सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥


जब अबुल-फ़तह जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का शासन था

(सन् १५५६ से सन् १६०५ तक) और धार्मिक तथा सांस्कृतिक चेतना क्षीण होती प्रतीत हो रही थी, तब गोस्वामी तुलसीदास ने सन् १५७४-७५ में कलम उठाई और श्रीरामचरितमानस के माध्यम से सनातन धर्म के आदर्शों, मर्यादा, भक्ति और लोकमंगल की भावना को जन-जन तक पहुँचाकर समाज को जाग्रत करने का, संगठित करने का कार्य किया।

रामकथा ऐसी अद्भुत कथा है जिससे आज भी भ्रमित जनमानस दिशा, धैर्य और धर्म का आलोक प्राप्त कर रहा है।विचलित हृदयों को वह मर्यादा का मार्ग दिखाती है, निराश आत्माओं में आशा का दीप प्रज्वलित करती है और  राष्ट्रभक्त समाज को पुनः अपने सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है। यह कथा संयम है, सेवा है, प्रेरणा है;

यह शक्ति है, भक्ति है, विश्वास और स्वाध्याय है।

यह केवल आख्यान नहीं, अपितु मानव जीवन को धर्म, मर्यादा और आत्मोन्नति की ओर ले जाने वाला दिव्य पथ है।


बालधी विसाल विकराल ज्वाल-जाल मानौं, लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है। कैथौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, बीररस बीर तरवारि सी उघारी है।। तुलसी सुरेस चाप, कैध दामिनी कलाप, कैध चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है। देखे जातुधान जातुधानी अकुलानी कहें, "कानन उजार्यो अब नगर प्रजारी है l 

(कवितावली )

आचार्य जी ने सुंदर कांड के एक अत्यन्त भावनापूर्ण प्रसंग  का उल्लेख किया वह प्रसंग क्या है जानने के लिए  सुनें l