प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष त्रयोदशी / चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७६४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४६
जो हम बोलते हैं, वही हमारे आचरण में भी प्रकट हो और हमारा शरीर उसी के अनुसार कार्य करे तो हमारा जीवन स्वाभाविक रूप से शुद्ध और पवित्र बन जाएगा l
यदि मनुष्य केवल अच्छे शब्द बोलता रहे, परन्तु उसका व्यवहार उसके विपरीत हो, तो जीवन में असंगति और कृत्रिमता उत्पन्न होती है।
हमारी प्रगति केवल बाहरी साधनों या अवसरों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मुख्य रूप से हमारे आन्तरिक और शारीरिक संतुलन पर आधारित होती है। यदि हमारा शरीर रोगमुक्त, सशक्त और सक्रिय रहता है, तो हम परिश्रम करने में सक्षम होते हैं और अपने कार्यों को निरन्तरता के साथ पूरा कर सकते हैं। शरीर की अस्वस्थता हमारी क्षमता को सीमित कर देती है और हमारे कार्य में बाधा उत्पन्न करती है।
इसी प्रकार, यदि हमारा मन स्थिर, शांत और सकारात्मक विचारों से युक्त रहता है, तो हम तनाव, भय और भ्रम से मुक्त होकर अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रह सकते हैं। अस्थिर मन हमें बार-बार दिशा से भटका देता है और हमारी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।
बुद्धि का स्पष्ट, विवेकपूर्ण और सही निर्णय लेने में सक्षम होना भी अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि बुद्धि ही हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करती है। यदि हमारे निर्णय गलत हों, तो हमारे प्रयास भी सफल नहीं हो पाते।
जब हमारा शरीर, मन और बुद्धि—ये तीनों सम्यक रूप से संतुलित होते हैं, तभी हम अपने जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त करते हैं। यही संतुलन वास्तविक प्रगति का आधार है, और इसके बिना हमारी उन्नति पूर्ण रूप से सम्भव नहीं होती।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥
मनुष्य अपने ही कर्मों से अपने भविष्य का निर्माण करता है। यदि वह गलत कार्य करता है या अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, तो उसका परिणाम अवश्य ही दुःख के रूप में सामने आता है। उस समय वह पछताता है, परन्तु समझ की कमी के कारण वह अपने कर्मों को न देखकर भाग्य, समय या ईश्वर को दोष देने लगता है।
तुलसीदासजी यहाँ यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक उत्तरदायित्व मनुष्य के अपने कर्मों का होता है। इसलिए जीवन में विवेकपूर्वक कर्म करना ही उचित है l
आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम अपने भाव सुस्थिर रखने का प्रयास करें अर्थात् मन, चित्त, भावनाओं को ऐसी अवस्था में रखें कि वे डगमगाएँ नहीं, विचलित न हों, और एक ही दिशा में स्थिर रहें। हमारे भावों में शौर्य से प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति हो समाज और राष्ट्र का हित हो l यही रामकाज है, जिसे हनुमान जी ने पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ सम्पन्न किया।
हनुमान जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन को भगवान राम के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी वाणी, शरीर, बुद्धि और शक्ति सभी को केवल रामकाज में लगा दिया। लंका-गमन, सीता-खोज, संजीवनी लाना आदि उनके इसी समर्पण के उदाहरण हैं।
भगवान् राम पूछते हैं
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥3॥
हे हनुमान! बताओ तो, रावण के द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े बाँके किले को तुमने किस तरह जलाया?
जब हनुमान जी देखते हैं कि प्रभु प्रसन्न हैं, तो उनका अहंकार पूर्णतः समाप्त हो जाता है। वे समझते हैं कि उनके सभी कार्य केवल प्रभु की कृपा से ही संभव हुए हैं। इसलिए वे विनम्र होकर उत्तर देते हैं।
अनपायिनी भक्ति को आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया,चम्मच से पैसा कौन हटा देता था,नरेन्द्र ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कैसी परीक्षा ली, गुरुता क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l