एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥6॥
हे तात! आप केवल इतना कार्य कीजिए कि वहाँ जाकर माता सीता को देख आएँ और उनकी सुधि लेकर लौट आएँ। उसके बाद कमलनयन प्रभु श्रीराम अपने भुजबल से, वानर सेना सहित, खेल-खेल में ही सब कार्य सिद्ध कर देंगे l
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी / द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७६२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४४
यदि हम युगभारती के सदस्य “राष्ट्र प्रथम” के पवित्र भाव को अपने जीवन का आधार बनाकर परस्पर प्रेम, आत्मीयता और सहयोग से संयुत रहेंगे , तो उसका परिणाम केवल संगठन की उन्नति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
ऐसे जीवनमूल्यों का प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता। भावी पीढ़ियाँ शब्दों से नहीं, उदाहरणों से प्रेरित होती हैं। जब वे देखती हैं कि एक संगठन के सदस्य राष्ट्र, संस्कृति और समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से एकजुट होकर कार्य कर रहे हैं, तब उनके भीतर भी सेवा, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार जाग्रत होते हैं। इस प्रकार वर्तमान का सद्भाव भविष्य की प्रेरणा बन जाता है।
आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस, जो प्रमुख रूप से भगवान राम के वनवास की कथा है,के सुन्दरकाण्ड में प्रविष्ट हैं इस कांड में हनुमान जी केवल बल और पराक्रम के प्रतीक नहीं हैं, अपितु वे अन्तःस्थित भक्ति, अटूट विश्वास और जाग्रत आत्मशक्ति के भी मूर्त स्वरूप हैं।
जब हम हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और विश्वास को अपने भीतर धारण करेंगे तब हमें अनुभव होगा कि हमारे भीतर भी असम्भव को सम्भव करने की क्षमता विद्यमान है। यह शक्ति बाहर से प्राप्त नहीं होती; यह तो आत्मा में निहित दिव्य चेतना का जागरण है। हनुमान जी स्वयं इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। जाम्बवान् के स्मरण कराने पर उन्हें अपनी सुप्त शक्ति का बोध हुआ और वे समुद्र लाँघने में समर्थ हुए। इसका गूढ़ संकेत यह है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी अनन्त सामर्थ्य विद्यमान है, किन्तु वह श्रद्धा और आत्मविश्वास के अभाव में सुप्त पड़ा रहता है।
लंका जैसी दुर्जेय नगरी में प्रवेश करना, राक्षसों का सामना करना, माता सीता को आश्वस्त करना और सम्पूर्ण लंका को दग्ध कर देना—ये सभी कार्य हनुमान जी ने किए l
लंका को दग्ध करने के पश्चात् वे माता सीता के पास पहुंच जाते हैं
माता! जैसे प्रभु श्रीराम ने मुझे अपनी मुद्रिका देकर भेजा था, वैसे ही आप भी कोई चिन्ह दीजिए, जिससे प्रभु को विश्वास हो और उन्हें आपकी सुधि प्राप्त हो।
तब माता सीता अपने मस्तक की चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को देती हैं। वह केवल आभूषण नहीं था; वह विरह, विश्वास और आशा का प्रतीक था। माता सीता हनुमान जी के माध्यम से प्रभु श्रीराम को अपना सन्देश भी भेजती हैं। उनके वचनों में करुणा, धैर्य और राम के प्रति अनन्य समर्पण झलकता है।
हनुमान जी माता को धैर्य बँधाते हैं कि प्रभु शीघ्र ही वानर सेना सहित लंका आएँगे और रावण का विनाश करके उन्हें पुनः सम्मान सहित ले जाएँगे। इस समय हनुमान जी केवल दूत नहीं रहते; वे आशा और विश्वास के आधार बन जाते हैं।
हनुमान जी भगवान राम को सब बता देते हैं
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥
छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना (और कहना कि) आप दीनबंधु हैं, शरणागत के दुःखों को हरने वाले हैं और मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ। फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया?॥2॥
इसके विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें