30.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३५ वां* सार -संक्षेप

 नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥3॥


अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥

करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥4॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१७

व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और व्यापक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए हम आज से ही कटिबद्ध हो जाएं l आपत्ति के समय बुद्धि भ्रमित न हो इसका प्रयास करें l 

खानपान विकृत न रखें l 



किष्किन्धा काण्ड के माध्यम से भगवान् राम यह बताते हैं कि इस भारत राष्ट्र की समस्या केवल इतनी नहीं है कि रावण अत्याचारी है, बल्कि यहाँ का एक बहुत बड़ा वर्ग इस व्यामोह में फँस गया है कि वह स्वयं भी रावण बन सकता है। और जब प्रत्येक व्यक्ति रावण बनने की मानसिकता में बैठ जाएगा , तब राष्ट्र को बचाने वाला कौन रहेगा। किसी भी समाज या राष्ट्र का पतन केवल बाहरी शत्रु के कारण नहीं होता, बल्कि उससे कहीं अधिक विकट वह स्थिति होती है जब समाज के भीतर ही लोग स्वार्थ, अहंकार और अधिकार-लोलुपता के वशीभूत होकर उसी मार्ग पर चलने लगते हैं, जिस पर चलकर रावण जैसा चरित्र उत्पन्न होता है। रावण केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है lजब यह प्रवृत्ति समाज में फैलने लगती है, तब समस्या किसी एक रावण के नाश से समाप्त नहीं होती।

किष्किन्धा काण्ड में बालि और सुग्रीव का प्रसंग इसी सत्य को स्पष्ट करता है। बालि में अपार शक्ति थी, परंतु उसने अपने ही भाई के अधिकार का हरण कर लिया और अन्याय का मार्ग अपनाया। यह  यह दर्शाता है कि जब शक्ति के साथ मर्यादा और धर्म का अभाव हो जाता है, तब वही शक्ति विनाश का कारण बनती है। दूसरी ओर सुग्रीव 


 (पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥

सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥ )

भय और भ्रम में जी रहा था,वह शक्तिहीन होने का अनुभव करता था परंतु जब उसे सही मार्गदर्शन मिला, तब वह धर्म के पक्ष में खड़ा हुआ और भगवान् राम के कार्य में सहयोगी बना। आज के संदर्भ में इसे देखें तो समाधान यह है कि हम अपने आचरण को मर्यादित बनाएं अहंकार का त्याग करें और सामूहिक हित को प्राथमिकता दें । जब समाज में हमारे समान अधिक से अधिक लोग (सनातन) धर्म के पक्ष में खड़े होंगे , तभी रावण जैसी प्रवृत्तियों का अंत संभव होगा और राष्ट्र सुरक्षित रह सकेगा l


क्या कबन्ध ने भी भगवान् राम से कहा था कि आप सुग्रीव के पास जाइये 

"सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।

प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि" किसने कहा   परचून की दुकान कौन है भैया संतोष मिश्र जी की चर्चा क्यों हुई जानने के सुनें