1.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३६ वां* सार -संक्षेप

 आत्मदर्शन के लिए कुछ क्षण सहज एकांत हो, 

विषवल्लरी से मुक्त स्वच्छाराम मन अश्रांत हो, 

शिवशक्ति तन में हो मगर निज वृत्ति शुचि अभ्रान्त हो, 

इस दीनदुनिया से अनासक्तित्व नित्य नितांत हो ॥


(आराम = बगीचा)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१८


 हमारे लिए गृहस्थ जीवन में कर्तव्य निभाना, संबंधों को निभाना, आर्थिक प्रयास करना ये सब आवश्यक हैं  किन्तु इनके बीच अपने आत्मिक स्वरूप को न भूलना ही साधना है। जब कर्म करते हुए भी मन ईश्वर-चिन्तन में स्थिर रहता है, तब जीवन बोझ नहीं, बल्कि एक सुन्दर साधना बन जाता है।




यह हमारा परम सौभाग्य है कि गृहस्थ आश्रम में स्थित रहते हुए भी भगवत्ता के अखण्ड चिन्तन में रत आचार्य जी हमारा नित्य मार्गदर्शन कर रहे हैं। हमें इसका लाभ उठाना चाहिए l

हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने की मानव जीवन के सुख-दुःख, करुणा, प्रेम, धर्म और मर्यादा की गहन अनुभूति करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘ श्री रामचरितमानस’ जैसे अद्भुत और लोकमंगलकारी ग्रन्थ की रचना कर दी जिसके किष्किन्धा कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं 


राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब व्याकुल धावा॥ नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥1॥

भगवान् राम ने बालि को उसके वास्तविक धाम (परम लोक) भेज दिया अर्थात् उसका वध कर उसे मोक्ष प्रदान किया। जैसे ही यह समाचार नगर में फैला, सभी लोग अत्यंत व्याकुल होकर घटनास्थल की ओर दौड़ पड़े। बालि की पत्नी तारा शोक से अत्यंत व्यथित हो उठी। वह विभिन्न प्रकार से विलाप करने लगी। दुःख की तीव्रता इतनी अधिक थी कि वह अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रख पा रही थी, उसके केश बिखर गए थे और वह स्वयं को संभालने में असमर्थ हो गई थी।


भगवान् तारा को आत्मज्ञान देकर शोक से उबारते हैं और उसे जीवन की नश्वरता का बोध कराते हैं


वे तारा से कहते हैं कि जो शरीर सामने पड़ा है, वही उसकी नश्वर देह है; जीव (आत्मा) तो नित्य और अमर है, फिर शोक किसके लिए? यह सुनकर तारा को ज्ञान हो गया, वह भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और उनसे परम भक्ति का वरदान माँग लिया।


इसके आगे की कथा में आचार्य जी ने क्या बताया,भगवानीयत क्या है,सूरदास जी के गुरु कौन थे,तारा और मन्दोदरी की गिनती पंचकन्याओं में क्यों होती है जानने के लिए सुनें