बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसें॥2॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७३७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१९
द्रष्टा स्रष्टा चिन्तक कवि तुलसीदास जी कृत श्रीरामचरित मानस का हम अध्ययन करें इसे गुनें और अपने जीवन के सूत्र खोजें
यह सदाचार वेला ऐसा समय है जब हम अपने आचरण, विचार और भावों को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं इस भाव-जगत में प्रवेश करने पर हम अपने भीतर श्रेष्ठ विचारों, नैतिकता और आध्यात्मिकता को स्थान देते हैं
जब हम दिन का प्रारम्भ अच्छे विचारों, सद्गुणों और शुद्ध भावनाओं के साथ करेंगे तो हमारा पूरा दिन और जीवन अधिक सार्थक, संतुलित और आनंदमय बन जाएगा l तो आइये प्रवेश करें आज की वेला में
हम पुनः प्रविष्ट हो जाते हैं किष्किन्धा कांड में
सुग्रीव का राजतिलक हो चुका है अंगद युवराज बन चुका है
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।। कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।
स्वच्छ, सुंदर स्फटिक शिला अत्यंत मनोहर है। उस पर दोनों भाई भगवान् राम और लक्ष्मण आनंदपूर्वक बैठे हैं। भगवान् राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण से अनेक प्रकार की कथाएँ कह रहे हैं, जिनमें भक्ति (ईश्वर प्रेम), विरक्ति (वैराग्य), राजनीति (राजधर्म) और विवेक (सही-गलत का ज्ञान) की बातें सम्मिलित हैं।
भक्ति का निरूपण शाण्डिल्य भक्ति सूत्र में, वैराग्य का प्रतिपादन सांख्य दर्शन में, नीति का विवेचन धर्मशास्त्र में तथा ज्ञान का प्रतिपादन वेदान्त दर्शन में किया गया है।
जीवन की पूर्णता के लिए भक्ति, वैराग्य, नीति और ज्ञान—इन चारों का संतुलित समन्वय आवश्यक है।
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि।
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नुभगत कहुँ देखि॥13॥
भगवान् राम कहने लगे हे लक्ष्मण! देखो, मोरों के झुंड बादलों को देखकर नाच रहे हैं जैसे वैराग्य में अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होते हैं
इसके अतिरिक्त अनुरागवान् गृहस्थ क्या करता है
भैया आशीष जोग जी द्वारा आचार्य जी को प्रेषित पिङ्गल कृत छन्दः सूत्रम् की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें