चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७४५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२७
अपने व्यक्तित्व को जटिल न बनाएं l राजनैतिक और सांगठनिक दोनों नेतृत्व पर विश्वास रखें l
हर स्वांस ओर प्रस्वांस में ,
निज नेता पर विश्वास हो ।
राष्ट्र- कार्य के लिए संकल्पबद्ध हों l
यदि हम किसी एक दुर्गुण को अपने जीवन में स्थान दे देते हैं और उसे छोड़ने का प्रयास नहीं करते , तो धीरे-धीरे अन्य अनेक दुर्गुण भी हमारे स्वभाव में प्रवेश करने लगते हैं। एक छोटा-सा अवगुण कालान्तर में सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है। इस कारण हमें एक दुर्गुण से भी बचना चाहिए इसके विपरीत यदि हम अपने भीतर सद्गुणों का विशाल भण्डार विकसित करना चाहते हैं, तो हमें किसी एक श्रेष्ठ गुण को दृढ़तापूर्वक धारण कर लेना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। जब हम एक सद्गुण को स्थिरता एवं निष्ठा के साथ जीवन में उतार लेते हैं , तब धीरे-धीरे अन्य सद्गुण भी स्वतः हमारे व्यक्तित्व में विकसित होने लगते हैं। कालान्तर में हमारा चरित्र उत्तम गुणों से सम्पन्न हो जाता है और हमारा जीवन आदर्शमय बन जाता है।
हम एक यही सद्गुण अपना लें कि हम राष्ट्र -कार्य के लिए संकल्पबद्ध होंगे l
संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो।
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो॥
हमारा लक्ष्य भी है राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
हमारा राष्ट्र अद्भुत है हमारे ऋषियों ने सामान्य जनमानस को संस्कारित किया, उसे धर्म, कर्तव्य, सदाचार तथा लोकमंगल की भावना से अनुप्राणित किया; तभी यह भारत एक सशक्त राष्ट्र के रूप में हमारे समक्ष प्रतिष्ठित हुआ है। यह केवल भूमि का एक साधारण टुकड़ा नहीं, अपितु अनादिकाल से प्रवाहित सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक साधना, त्याग, तपस्या तथा राष्ट्रीय एकात्मता का जीवंत स्वरूप है।
भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया मनोज अवस्थी जी, भैया अजय शंकर दीक्षित जी, भैया दिनेश प्रताप जी, भैया अखिल तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, संपाती की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें