11.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२८

हम किसी भी कार्य को उत्साह, प्रसन्नता और पूर्ण मनोयोग के साथ करें व्याकुलता, कुंठा, निराशा तथा हीनभावना से दूर रहकर किए गए कार्य न केवल अधिक सफल होते हैं , बल्कि उनसे मन में संतोष, आत्मविश्वास और नवीन ऊर्जा का भी संचार होता है l 

इस परामर्श पर अवश्य ध्यान दें l



हमें चाहिए कि हम अपने सामर्थ्य, क्षमता और गुणों का यथार्थ आकलन करें तथा यह समझें कि हम सबके भीतर ईश्वरप्रदत्त विशेष शक्तियां निहित हैं । श्री हनुमान जी की प्रेरणा तथा भगवान् राम जी की कृपा से हम सभी में शौर्य , पराक्रम, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के पावन गुण किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। अतः हमें आत्महीनता अथवा आलस्य में पड़े रहने के स्थान पर अपने भीतर निहित शक्तियों को जाग्रत कर देश तथा समाज के हित में कार्य करने चाहिए किन्तु ध्यान दें कि प्रत्येक कर्म में ईश्वरार्पण की भावना कभी विस्मृत न हो l अपने परिवार का प्रेमपूर्वक एवं सदाचारयुक्त पालन-पोषण करें , दंभ रहित मन और शरीर से सबल बने रहें, अपने राष्ट्रभक्त साथियों के प्रति निष्कपट एवं सद्भावपूर्ण व्यवहार करें l

 तब हम केवल अपने व्यक्तिगत जीवन का ही उत्थान नहीं करेंगे बल्कि राष्ट्र और समाज की उन्नति में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देंगे l


जो जहाँ पर देश और समाज-हित कुछ कर रहा हो, 

और निज परिवार का सत्प्रेम पोषण कर रहा हो, 

स्वयं दर्प विमुक्त मन तन से सबल हो, 

साथियों से निष्कपट व्यवहार करने में सफल हो,

ईश्वरार्पित भाव क्षण भर हो न विस्मृत, 

वैखरी वाणी मधुर हो यथा अमृत, 

समझ लो वह सत्पुरुष आदर्श नर है, 

मरणधर्मा जगत में भी वह अमर है ॥

श्रीरामचरित मानस से हमें यही प्रेरणा मिलती है l 

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥

मन करि बिषय अनल बन जरई। होई सुखी जौं एहिं सर परई॥

स्वयंप्रभा को जब ज्ञात हुआ कि भगवान् राम लक्ष्मण वानर सेना सहित सीता की खोज में निकले हैं, तब उसने अपने योगबल से उन सबको उस दुर्गम गुहा से बाहर पहुँचा दिया, जिससे उनका कार्य पुनः आगे बढ़ सका और तब वानर सेना समुद्र तट पर पहुंच गयी l यह प्रसंग है किष्किन्धा कांड का जिसमें  तर्क कुतर्क से रहित होकर भक्तिभाव पूर्वक आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं 


इसके विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया अक्षय जी, भैया डा प्रदीप त्रिपाठी जी, भैया अजय शङ्कर जी, भैया पवन मिश्र जी, प्रधानाचार्य श्री राकेश राम जी का उल्लेख क्यों हुआ,यश का टीका और अपयश की कालिख क्या है,मोक्ष से अधिक किसमें आनन्द है, दंभी का शंका रहित होने पर पतन का क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें