प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७४४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२६
संन्यासी, साधु, ऋषि, मुनि, चिन्तक, विचारक, शिक्षक, आचार्य आदि समाज के नैतिक एवं आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक होते हैं। वे अपने तप, त्याग, ज्ञान और सेवा के माध्यम से समाज को सही दिशा प्रदान करते हैं। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत कल्याण के लिए नहीं, बल्कि लोकमंगल और राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित होता है। उनके प्रति उपेक्षा, अविश्वास या तिरस्कार का भाव उत्पन्न हो जाए, तो समाज अपने मूल आदर्शों से दूर होने लगता है। परिणामस्वरूप लोगों में स्वार्थ, भ्रम और नैतिक पतन बढ़ने लगता है।इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि राष्ट्र केवल भौतिक साधनों से महान नहीं बनता उसके लिए उच्च विचार, संस्कार और चरित्र भी आवश्यक हैं। अपनी सनातन परम्परा को हम ठीक प्रकार से जानें l प्रभात के वाहक बनें l
सामान्यतः समय का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है, किन्तु प्रत्येक क्षण सार्थक हो — यह आवश्यक नहीं। जब वही समय उत्तम विचारों, प्रेरणादायक प्रसंगों और चरित्र-निर्माण करने वाली बातों के श्रवण में लगाया जाता है, तब हमारे भीतर संस्कार, संयम और कर्तव्यबोध उत्पन्न करता है यह सदाचार-वेला आत्मचिन्तन और व्यक्तित्व-परिष्कार का अद्भुत माध्यम है। इसे सुनने से मन में शुभ विचार जाग्रत होते हैं, व्यवहार में शिष्टता आती है और जीवन को उचित दिशा मिलती है। इस प्रकार यह समय हमारे साथ समाज और राष्ट्र के लिए भी हितकारी बन जाता है।
साधना, उपासना, सेवा, तप, दान, अध्ययन और आत्मोन्नति — सब कुछ शरीर के माध्यम से ही संभव है। शरीर न हो तो न कर्म हो सकता है, न भक्ति, न ज्ञान का अभ्यास।
मनुष्य-जीवन केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि आत्म-विकास और परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिला है। यही कारण है कि संतों ने मानव-देह को “मोक्ष का द्वार” कहा है। यदि मनुष्य इस शरीर का उपयोग सदाचार, साधना और लोकमंगल में करे, तो वही देह उसे उच्चतम अवस्था तक पहुँचा सकती है और यदि दुरुपयोग करे, तो पतन का कारण भी बन सकती है।
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥
नर -तन को प्राप्त कर हम आनन्द की अनुभूति तभी कर सकते हैं जब हम इसमें अन्तर्निहित शक्तियों की अनुभूति भी करेंगे उसके रचनाकार के बारे में विचार करेंगे
इस मानव तन को केवल भौतिक सुखों का साधन न मानकर ईश्वर-प्रदत्त अमूल्य अवसर समझना चाहिए।
श्रीगुरुजी समग्र की चर्चा क्यों हुई, कुटिल लोभी अकबर का उल्लेख क्यों हुआ, डा हेडगेवार जी ने किसी व्यक्ति को गुरु क्यों नहीं बनाया,भैया मनोज अवस्थी जी को आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें