12.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४७ वां* सार -संक्षेप

 कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥

जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२९


सनातन धर्म में श्रद्धा विश्वास और रुचि रखने वाले हम राष्ट्रभक्तों को  प्रातःकाल शीघ्र जागना ही चाहिए साथ ही अपने आहार-विहार को सदैव शुद्ध एवं संयमित रखना चाहिए क्योंकि सुदृढ़ शरीर, संयमित आचरण और जाग्रत चेतना से ही हम धर्म, कर्तव्य और आत्मोन्नति के मार्ग पर स्थिर रह सकते हैं l



अपना तन, अपना मन, अपना जीवन, अपना परिवार, अपना समाज,अपना राष्ट्र और अपना विश्व —ये सब ‘अपनेपन’ के क्रमिक विस्तार हैं।

हमारा ‘स्व’ जितना संकीर्ण रहता है तो उतना ही हमारा जीवन सीमित और क्लेशपूर्ण होता है  किन्तु जैसे-जैसे अपनेपन का विस्तार होता जाता है, वैसे-वैसे हृदय में आनन्द, करुणा और आत्मीयता का उदय होने लगता है। हमारे अनेक ग्रंथ ऐसे हैं जो इसी प्रकार के गूढ़ तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण हैं  किन्तु उनकी भाषा और शैली हम लोगों के लिए कभी-कभी कठिन प्रतीत होती है।

इसके विपरीत, श्री रामचरितमानस


रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥

तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥


 ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जिसमें कथा है संदेश है और जिसमें उन्हीं उच्च आध्यात्मिक सिद्धान्तों को लोकभाषा में अत्यन्त सहज, सरस और हृदयग्राही रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस ग्रंथ के रहस्य को जानने पर हमें निश्चित रूप से आनन्द की अनुभूति होगी l

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥1॥


अंगद कहते हैं— “मैं समुद्र के पार तो चला जाऊँगा, किन्तु मन में यह सन्देह है कि पुनः लौट सकूँगा या नहीं।”

तब जाम्बवान् कहते हैं— “आप तो सब प्रकार से समर्थ हैं, किन्तु आप हम सबके नायक हैं; इसलिए आपको भेजना उचित नहीं है।”

हम पहुंच चुके हैं किष्किन्धा कांड के इस भाग में 


जब सम्पूर्ण वानर-सेना समुद्र पार करने की समस्या से चिन्तित थी, तब जाम्बवान् ने शिवावतार हनुमानजी को उनकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराया।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥


हनुमानजी ने जैसे ही जाम्बवान् के प्रेरणापूर्ण वचन सुने, वैसे ही उनकी सुप्त शक्ति जाग्रत हो उठी।

आचार्य जी से भी हमें उत्साह, विश्वास और उचित प्रेरणा मिल रही है हम भी अपने सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत करें असम्भव कार्यों को भी सम्भव करने का प्रयास करें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने 

कानपुर के चन्द्र शेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन बैच १९७८ के भैया संजीव गुप्त जी से कल हुई भेंट के विषय में क्या बताया जानने के लिए सुनें