प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी (अपरा एकादशी )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७४८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३०
शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की महत्ता को अवश्य जानें
अद्भुत है भारत और अद्भुत है भारतीय भाव। जिसे यह भाव जितनी मात्रा में प्राप्त हो जाता है, वह इस संसार-सागर में उतना ही अधिक आनन्द का अनुभव करता है भारतीय संस्कृति मनुष्य को केवल भौतिक उन्नति का मार्ग नहीं दिखाती, अपितु अन्तःकरण की शान्ति, आत्मीयता, करुणा, समत्व, शौर्य और पराक्रम का भी बोध कराती है। इसी कारण यहाँ जीवन को संघर्ष मात्र नहीं, बल्कि साधना और आनन्द की यात्रा माना गया है।
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि जो कुछ भी होता है, वह सब ईश्वर-नियति के अनुसार ही होता है और परमात्मा कभी किसी का अहित नहीं करता, तब उसके भीतर अटूट विश्वास जन्म लेता है। यह विश्वास उसे भय, संशय और मोह के बन्धनों से मुक्त कर देता है।
ऐसी अवस्था में व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर की ही कृपा और कल्याणकारी योजना के रूप में स्वीकार करता है। सुख और दुःख दोनों ही उसके लिए समान रूप से शिक्षण बन जाते हैं।
इस गहन समर्पण और निर्भय भाव में ही निर्भरा भक्ति का उदय होता है l
गोस्वामी तुलसीदास जी भी भगवान् राम, जिन्होंने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए जन्म लिया है, से इसी की कामना कर रहे हैं
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ 2॥
इसकी व्याख्या के साथ आचार्य जी ने सुन्दर कांड में और क्या बताया,आचार्य जी ने निर्वाण और गीर्वाण की चर्चा क्यों की, वरदान के दुरुपयोग पर शिव जी किसको दंड दे रहे हैं, सुन्दर कांड में सुन्दर क्या है जानने के लिए सुनें