14.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४९ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३१

इन सदाचार संप्रेषणों


तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥


 का श्रवण कर जाग्रत हों और  समाजोन्मुखी राष्ट्रोन्मुखी जीवनोन्मुखी उत्थानोन्मुखी कर्म के लिए उद्यत हों l पतनोन्मुखी कार्यव्यवहार से दूरी बनाएं l


भारतवर्ष सम्पूर्ण विश्व की प्राण-रेखा है। हम “भा” अर्थात् प्रकाश, ज्ञान और चेतना में रत रहने वाले भारतीय हैं; इसी कारण हमारा स्वभाव समस्त विश्व को आलोकित और भास्वर बनाने का रहा है। भारतीय संस्कृति, जो कर्मवादी ध्यानवादी विश्वासवादी संस्कृति है,केवल अपने उत्थान की नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की कामना करती है। यहाँ का जीवन-दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से प्रेरित होकर समस्त जगत् को एक परिवार मानता है। इसी कारण भारत ने युगों-युगों तक ज्ञान, अध्यात्म, करुणा, शान्ति और सदाचार का प्रकाश सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित किया है।

हम प्रकृति का शोषण नहीं करते, अपितु उसके उपासक और पूजक हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को जड़ वस्तु नहीं, बल्कि चेतना और जीवन की आधारशक्ति माना गया है। यही कारण है कि यहाँ नदियों को माता, पृथ्वी को धरणी, वनों को देवस्वरूप तथा पर्वतों को पूजनीय माना गया है।

हमारा दृष्टिकोण उपभोग का नहीं, सहअस्तित्व का है। हम प्रकृति से उतना ही ग्रहण करने की शिक्षा पाते हैं, जितना जीवन के लिए आवश्यक हो और उसके प्रति कृतज्ञता का भाव बनाए रखते हैं। इसी भावना ने भारतीय जीवन-पद्धति को संतुलन, संवेदना और संरक्षण का मार्ग प्रदान किया है।

श्रीरामचरित मानस एक अद्भुत अप्रतिम ग्रंथ है जिसके माध्यम से हम अपनी संस्कृति अपने इतिवृत्त को भलीभांति जान सकते हैंl तो आइये प्रवेश करें इसी ग्रंथ में l


जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥


 शिवावतार हनुमानजी कहते हैं—

“जब तक मैं माता सीता को देख न लूँ, तब तक यह कार्य पूर्ण नहीं माना जाएगा। किन्तु मुझे विशेष हर्ष है कि यह कार्य अवश्य सिद्ध होगा।”

ऐसा कहकर उन्होंने सब वानरों को प्रणाम किया और हृदय में प्रभु राम को धारण करके अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रस्थान किया।

हम प्रविष्ट हो चुके हैं सुन्दर कांड में जिससे हम शक्ति भक्ति विचार कौशल योग्यता आदि प्राप्त कर सकते हैं  और जिसकी इस चौपाई में हनुमान जी के  विश्वास,उत्साह, विनय और प्रभु-समर्पण का अत्यन्त सुन्दर चित्रण हुआ है।

सुन्दर कांड में आचार्य जी ने  आगे क्या बताया, त्रिकूट का क्या अर्थ बताया,  विरक्त हनुमान जी अनुरक्त कैसे हो गये, कवितावली का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l