नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा l
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७५० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३२
जहाँ श्रद्धा, सेवा,शौर्य और पराक्रम है वहाँ निराशा स्थायी नहीं रह सकती।
सुख हरषहिं जड़ दु:ख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥4॥
यह चौपाई सिखाती है कि जीवन में परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। सुख और दुःख दोनों क्षणिक हैं। जो मनुष्य धैर्य, संयम और विवेक बनाए रखता है, वही वास्तव में स्थिर और सफल जीवन जी पाता है।
कष्ट,व्यथा,दुःख,अशान्ति,असुविधा और पीड़ा की अवस्थाओं में सुन्दरकाण्ड का पाठ हम राष्ट्रभक्तों के अन्तःकरण में आशा, धैर्य और उत्साह का संचार करता है सुन्दर कांड भगवान् हनुमान जी के अद्भुत कर्म, उद्यम, सेवा, विवेक, वैराग्य, भक्ति, शौर्य, पराक्रम की कथा है l
हनुमान जी प्रत्येक परिस्थिति में धैर्यवान् रहते हैं। वे संकट देखकर विचलित नहीं होते, अपितु समाधान खोजते हैं। समुद्र लाँघना, लङ्का में प्रवेश करना, मां सीता की खोज करना, रावणसभा में निर्भीक रहना—ये सब उनके कर्मयोग, बुद्धि और निष्ठा के अद्भुत उदाहरण हैं।वे केवल बल के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि विनय, सेवा और समर्पण के भी आदर्श हैं। भगवान् राम के प्रति उनकी अखण्ड भक्ति ही उन्हें असम्भव कार्यों में भी सफल बनाती है।हनुमान जी शिक्षा देते हैं कि जीवन में दुःख और बाधाएँ आएँ, तब भयभीत न होकर उत्साह, विवेक और ईश्वर-स्मरण के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
आजकल हम लोग सुन्दर कांड में ही प्रविष्ट हैं और प्रसंग चल रहा है
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥
हनुमान जी कहते हैं कि “जब तक मैं माता सीता का दर्शन करके वापस नहीं आ जाता, तब तक आप सब प्रतीक्षा कीजिए। यह कार्य अवश्य सिद्ध होगा; मेरे हृदय में विशेष उत्साह और आनन्द है।”
ऐसा कहकर वे सब वानरों को प्रणाम करते हैं और हृदय में श्रीरघुनाथ जी को धारण करके अत्यन्त हर्षपूर्वक प्रस्थान करते हैं।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥॥
जब हनुमान जी समुद्र लाँघने के लिए पर्वत पर अपने चरण रखकर उछले, तब उनके अपार बल के प्रभाव से वह पर्वत तत्काल पाताल की ओर धँस गया।
तत्पश्चात् वे ऐसे वेग से आगे बढ़े जैसे श्रीरघुनाथ जी का अमोघ बाण लक्ष्य की ओर जाता है।
इसके आगे आचार्य जी ने नागमाता सुरसा का प्रसंग आदि बताया l
सुरसा प्रसंग सिखाता है कि जीवन की अनेक बाधाएँ केवल शक्ति से नहीं, बल्कि धैर्य, बुद्धिमत्ता और संतुलित व्यवहार से पार होती हैं।
आचार्य जी ने कहा कि हर लंका में एक विभीषण अवश्य होता है जिसका तात्पर्य है
अधर्म और अव्यवस्था के बीच भी सत्य, सदाचार और ईश्वरभक्ति का कोई न कोई आधार अवश्य विद्यमान रहता है।
Radar का उल्लेख क्यों हुआ, नेता और देवता में क्या समानता है, शूर्पणखा द्वारा सिद्धान्त की बात की चर्चा क्यों हुई, सत्संग क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l