राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७५१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३३
रामत्व और हनुमानत्व का अनुभव करें
प्रातःकाल की ये सदाचारमयी वेलाएँ अत्यन्त अद्भुत हैं जो हमें ज्ञान, सम्मान और अन्तःशुद्धि प्रदान कर रही हैं। हमें चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करा रही हैं l
समय का परिपालन और समय का सदुपयोग संसार में सफलता प्राप्त करने के लिए अत्यन्त आवश्यक और अनिवार्य होता है।
दान एक महान् धर्म है, जो हमारे हृदय में करुणा, उदारता और लोकमंगल की भावना उत्पन्न करता है। विसंगतियां उत्पन्न करने वाले दुष्टों के विरुद्ध समयानुकूल शक्ति का प्रदर्शन अत्यन्त आवश्यक है।
संसार तो विविध प्रपंचों से परिपूर्ण है ऐसे में यदि समय, शक्ति और धन का समन्वित एवं विवेकपूर्ण उपयोग हो, तो जीवन सहज ही आनन्दमय और सार्थक बन जाता है।
नररूप में लीला करने वाले भगवान् राम ने मानवता के सम्मुख एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है।
उन्होंने सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य, शौर्य, पराक्रम और धर्मपालन का जो पथ दिखाया, वह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए प्रेरणास्रोत है। हमें उनके चरित्र से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।
जब हम अपने जीवन को भगवान् राम के आदर्शों से संयुत करते हैं, तब हनुमानजी स्वयं भक्त और भगवान् के मध्य सेतु एवं मध्यस्थ के रूप में हमारा मार्गदर्शन करते हैं। आजकल हम लोग सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं जो हनुमान जी के कर्ममय उद्धरणों का एक साक्षी है
हनुमान जी मां सीता की खोज में लंका में विचरण कर रहे थे, तब उन्हें एक ऐसा घर दिखाई पड़ा जो अन्य राक्षसों के भवनों से भिन्न था।
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥5॥
जिस घर पर भगवान् राम के आयुधों (धनुष-बाण आदि) के चिह्न अंकित थे, उस घर की शोभा वर्णन से परे थी। वहाँ नवीन तुलसी के समूहों को देखकर कपिश्रेष्ठ हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न हुए।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥
सद्वृत्तियों के साथ जन्मे विभीषण का स्वभाव अत्यन्त विनम्र, धर्मनिष्ठ और सत्संगप्रिय था। जैसे ही उन्होंने ब्राह्मण रूपधारी हनुमान जी के मुख से मधुर एवं सात्त्विक वचन सुने, वे आदरपूर्वक उनके पास आए। उन्होंने पहले प्रणाम किया, फिर उनकी कुशल पूछी और विनयपूर्वक परिचय जानना चाहा।
'दशरथ राज्य में मनुष्य पीड़ित था' से आचार्य जी क्या कहना चाह रहे हैं,संविधान की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें