17.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५२ वां* सार

 छाँड़ि मन हरि-विमुखन को संग। जाके संग कुबुधि उपजति है, परत भजन में भंग। कहा भयौ पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग।


(हे मेरे मन! तू ईश्वर से विमुख (दूर) रहने वाले लोगों का साथ छोड़ दे....)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३४

प्रतिभा का पलायन विचारणीय है प्रतिभा का दुरुपयोग न हो इसका प्रयास हो 

प्रतिभा ईश्वरप्रदत्त शक्ति है; उसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उत्कर्ष नहीं, अपितु समाज, संस्कृति और राष्ट्र की उन्नति भी है। यदि प्रतिभा सदुपयोग की दिशा में प्रवाहित हो, तो वही राष्ट्र को विश्वगुरु बना सकती है; किन्तु यदि उसका दुरुपयोग हो, तो वही शक्ति संकट का कारण भी बन सकती है।



सनातन धर्म को क्षीण करने के कुत्सित किन्तु कभी सफल न होने वाले प्रयास युग-युग में होते रहे हैं और आज भी विविध रूपों में दृष्टिगोचर हो रहे हैं किन्तु हमें केवल मौन द्रष्टा बनकर परिस्थितियों को देखना नहीं है, अपितु स्रष्टा बनकर धर्म, संस्कृति, सदाचार और मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण में सक्रिय योगदान देना है।

धर्म की रक्षा केवल वाणी से नहीं, अपितु आचरण, ज्ञान, करुणा, संयम, शौर्य, पराक्रम और संगठन से होती है। जब हम अपने जीवन में सत्य, सेवा, शील, संस्कार, शौर्य, पराक्रम को प्रतिष्ठित करते हैं, तभी वास्तविक रूप से सनातन की रक्षा होती है।

भगवान् श्रीराम,भगवान् श्रीकृष्ण के साथ असंख्य ऋषियों मुनियों चिन्तकों योद्धाओं आदि ने हमें यही शिक्षा दी कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्ममार्ग का सृजनात्मक प्रकाश बुझने नहीं देना चाहिए।

अतः आवश्यक है कि हम अपनी परम्पराओं का गम्भीर अध्ययन करें,नई पीढ़ी को संस्कार दें,राष्ट्रभक्त समाज में समरसता और सद्भाव बढ़ाएँ तथा राष्ट्र और संस्कृति के उत्कर्ष हेतु सकारात्मक शक्ति बनें। सनातन की वास्तविक सेवा यही है कि हम स्वयं दीपक बनकर अन्य दीपों को प्रज्वलित करें।

गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यन्त विषम सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिस्थितियों में भी अद्भुत धैर्य, श्रद्धा और लोकमंगल की भावना के साथ रामचरितमानस जैसे अमर ग्रन्थ की रचना की जो हमें शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराता है । उस समय समाज अनेक प्रकार के विघटन, निराशा, सांस्कृतिक अस्थिरता और नैतिक पतन से जूझ रहा था। यह ग्रंथ हमें उत्साह, शक्ति, बुद्धि, विचार, कौशल आदि प्रदान करता है और इसके सुन्दर कांड में  आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l 


अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥7॥

हनुमान जी का यह विनम्र स्वभाव उनको महान् बना देता है l

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥

इसके बाद विभीषण ने विस्तारपूर्वक वह सब कथा कही कि जनकनन्दिनी सीता जी किस प्रकार अशोक वाटिका में रह रही हैं, उनकी अवस्था कैसी है और रावण उन्हें किस प्रकार कष्ट दे रहा है। यह सुनकर हनुमान जी ने कहा—

“हे भ्राता! अब मैं माता जानकी के दर्शन करना चाहता हूँ।”


युगभारती के पूर्व अध्यक्ष रहे स्व भैया राजेश पांडेय जी की चर्चा क्यों हुई, संगठन के कार्य क्या कालापेक्षी हैं जानने के लिए सुनें l