18.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५३ वां* सार -संक्षेप

 भाव की भाषा जहां व्यवहार के पथ पर चली है

और सात्विक शक्ति को चैतन्य की झंकृति मिली है

वहीं सन्निधि का अनोखा प्रेममय संबल मिला है 

सहज प्रेमी साथियों का हर तरह का बल मिला है

इसी बल को ज्ञानियों ने संगठन का नाम देकर

और मानव को विधाता ने यशस्वी काम देकर

जगत के झंझा झकोरों पर विजय का पथ दिखाया

और मानव को मनन चिन्तन भरा जीवन सुझाया



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३५


लक्ष्य तक पहुँचे बिना, पथ में पथिक विश्राम कैसा


जब तक हम अपने उद्देश्य की प्राप्ति न कर लें , तब तक हमें आलस्य, निराशा आदि में नहीं पड़ना चाहिए। सच्चा कर्मयोगी निरन्तर प्रयास, धैर्य और संकल्प के साथ आगे बढ़ता रहता है। लक्ष्य की सिद्धि से पूर्व विश्राम करना पुरुषार्थ और कर्तव्य के मार्ग से विचलित होना माना गया है।



उच्च कोटि के चिन्तक विचारक लेखक सनातनधर्म के आराधक और राष्ट्र के एक जाग्रत पुरोहित के रूप में आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हमारी जैसी सनातन धर्म में आस्था रखने वाली राष्ट्रभक्त शक्तियाँ  जाग्रत एवं सजग हों मात्र पूजा ध्यान धारणा संसार का प्राप्तव्य नहीं है उद्देश्य यह है कि हम धर्मनिष्ठ जन आत्मबल, शौर्य, संयम और संगठन से शक्तिसम्पन्न बनें,हमारी चेतना प्रखर हो तथा हम धर्म, संस्कृति और राष्ट्ररक्षा के प्रति सदैव तत्पर रहें  ताकि दुष्ट, अधर्मी और राष्ट्रविघातक प्रवृत्तियाँ हमारे तेज, साहस और अनुशासन से भयभीत रहकर अनिष्ट करने का साहस न कर सकें।

हम केवल विचारों में नहीं, बल्कि प्रेम, अनुशासन, कर्तव्य और परस्पर सहयोग में संयुत हों , तब हमारी शक्ति समाज और राष्ट्र के उत्थान का आधार बनेगी l

विधाता ने हमें यशस्वी कर्म का वरदान देकर ऐसा जीवन-पथ दिखाया है, जिसमें मनन, चिन्तन, साहस और सत्कर्म का समन्वय है l

इसी आदर्श का सर्वोत्तम प्रत्यक्ष स्वरूप भगवान् राम के जीवन में दिखाई देता है। यद्यपि वे परम दिव्य सत्ता थे, तथापि उन्होंने लोकमंगल हेतु मायामय नर-लीला करते हुए मनुष्य रूप में अवतार ग्रहण किया।

उन्होंने यह प्रदर्शित किया कि आदर्श जीवन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि मर्यादा, त्याग, धैर्य, शौर्य, करुणा और कर्तव्यपालन से निर्मित होता है। उन्हीं के भक्त हनुमान जी का चरित्र यह उद्घोष करता है कि सच्ची शक्ति वही है जो अहंकार से मुक्त होकर धर्म और कर्तव्य के लिए समर्पित हो।

सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का चरित्र सम्पूर्ण रामायण में सबसे अधिक प्रेरणादायी और तेजस्वी रूप में प्रकट हुआ है अब हम पहुंच रहे हैं उस प्रसंग में जब हनुमान जी लंका में  मां सीता की खोज करते हुए विभीषण से भेंट करते हैं 


पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥


विभीषण उन्हें सीता जी के अशोक वाटिका में होने की बात बताते हैं, तब हनुमान जी कहते हैं कि वे मां सीता के दर्शन करना चाहते हैं 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया 

केश और किसमें भेद है भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ तृण क्या कर सकता है जानने के लिए सुनें