"धर्म " मनुष्यों के जीवन का, एकमेव है अनुशासन ।
इस पर ही आधारित रहता है, उसका उत्थान-पतन ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७५४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३६
विनम्रता, सदाचार, संयम, करुणा,त्याग, शौर्य, पराक्रम जैसे दिव्य गुणों को अपने जीवन में प्रवेश कराएं ताकि जीवन मंगलमय हो सके l अपने कार्य व्यवहार पर दंभ न करें l
प्रातःकाल का जागरण, अध्ययन, स्वाध्याय तथा इन पवित्र वेलाओं के सदाचारमय विचारों का श्रवण हमारे जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी एवं कल्याणकारी है l हमें इनका लाभ उठाना चाहिए ताकि हम संसार के प्रपंचों संकटों से मुक्त रहकर आनन्द में रह सकें l
अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करें क्योंकि आत्मबोध से ही स्थायी आनन्द और सच्ची शान्ति की प्राप्ति होती है।
हनुमान जी जब तक अपनी शक्ति को विस्मृत किए रहते हैं, तब तक वे सामान्य वानर के समान प्रतीत होते हैं; किन्तु जैसे ही उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप और सामर्थ्य का स्मरण कराया जाता है, वे समुद्र लाँघकर असम्भव कार्य को भी सिद्ध कर देते हैं। मानस में सुन्दरकाण्ड यह प्रेरणा देता है कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर, विनम्रता और भक्ति के साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। तो आइये
अब हम प्रवेश करें सुन्दर कांड में
पृथ्वी की पुत्री मां सीता पृथ्वी के समान धैर्य, करुणा और दिव्य गुणों से परिपूर्ण जनकनन्दिनी हैं। वे अशोक-वाटिका में रहने पर भी अपने पवित्र चरित्र, धैर्य और अटल पतिव्रत-धर्म से सम्पूर्ण संसार को आदर्श प्रदान कर रही हैं।
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥1॥
हनुमान जी अशोक-वाटिका में वृक्ष के पत्तों के बीच छिपकर बैठे हैं। वे मन ही मन विचार कर रहे हैं कि अब किस प्रकार मां सीता से भेंट करूँ और उन्हें प्रभु राम का सन्देश दूँ। उसी समय रावण अनेक सुसज्जित स्त्रियों के साथ वहाँ आ पहुँचता है।
उस दुष्ट ने सीता जी को बहुत प्रकार से समझाया। साम, दान, भय और भेद दिखलाया।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया
भैया प्रतीप दुबे जी,भैया अक्षय जी, भैया मुकेश जी, भैया अजीत जी, भैया आलोक सांवल जी के नाम आचार्य जी ने क्यों लिए जानने के लिए सुनें l