20.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३७


श्रीरामचरितमानस का अध्ययन ध्यानपूर्वक करें और संकल्पबद्ध हों 


निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥8॥


यह दोहा श्रीरामचरितमानस के सुन्दर कांड में एक अत्यन्त करुण प्रसंग  का है जहाँ हनुमान जी अशोक-वाटिका में मां सीता को अत्यन्त दुःखी अवस्था में देखते है l 

माता जानकी ने अपने नेत्र अपने चरणों पर स्थिर कर रखे थे और उनका मन भगवान् श्रीराम के चरण-कमलों में पूर्णतः लीन था। वे बाह्य संसार से विरक्त होकर केवल प्रभु-स्मरण में निमग्न थीं। उनके शरीर में दुःख, विरह और कष्ट स्पष्ट दिखाई देता था, परन्तु अन्तःकरण में श्रीराम के प्रति अखण्ड श्रद्धा और प्रेम विद्यमान था।

जब पवनपुत्र हनुमान जी ने जनकनन्दिनी सीता की ऐसी दीन, क्षीण और करुण अवस्था देखी, तब वे अत्यन्त दुःखी हो उठे। उनके हृदय में करुणा, भक्ति और सेवा का भाव एक साथ उमड़ पड़ा। यह दृश्य केवल एक भक्त की संवेदना नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के प्रति समर्पित हृदय की व्यथा को भी प्रकट करता है।

यदि इसी भाव को भारतमाता के संदर्भ में देखें, तो इसका अर्थ अत्यन्त प्रेरणादायक है।जब राष्ट्र अपनी संस्कृति, एकता और आदर्शों से दूर होने लगता है, तब भारतमाता की स्थिति भी मानो अशोक-वाटिका में बैठी सीतामाता जैसी करुण प्रतीत होती है।

ऐसी अवस्था को देखकर हम हनुमान जी के भक्त राष्ट्रभक्तों  के भीतर हनुमानजी जैसा सेवाभाव जाग्रत होना चाहिए। जैसे हनुमानजी ने निराशा के बीच आशा, साहस और प्रभु-संदेश पहुँचाया, वैसे ही हमें भारतमाता के गौरव, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के संरक्षण हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l हनुमान जी अपने प्रयासों में कभी असफल नहीं हुए हम भी यही भाव रखें l 

कथा में आगे 

 सीता जी को विरह से परम व्याकुल देखकर वह क्षण हनुमान जी को कल्प के समान बीता॥


कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।

जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥12॥


माता सीता ने जब श्रीराम के नाम से अंकित वह मुद्रिका देखी, तब वे आश्चर्य से भर गईं। उन्होंने उसे पहचान लिया कि यह प्रभु श्रीराम की ही अंगूठी है। उस समय उनके हृदय में एक साथ हर्ष और विषाद दोनों उमड़ पड़े l 

इसके आगे  आचार्य जी ने क्या बताया,भैया पंकज श्रीवास्तव  जी, भैया शुभेन्दु शेखर जी , भैया शुभेन्द्र सिंह जी का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं, माताओं का ध्यान चरणों पर रहता है किन्तु पुरुषों का ध्यान कहां रहता है, त्रिदंड सन्न्यास क्या है जानने के लिए सुनें l