3.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३८ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२०

शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की महत्ता को जानें 


हम प्रविष्ट हैं किष्किन्धा कांड में 


अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।

जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।

राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।



अंगद कहते हैं कि वे समुद्र पार तो जा सकते हैं, पर उनके मन में यह संदेह है कि वे लौट पाएँगे या नहीं। इस पर जामवंत उत्तर देते हैं कि तुम सब ही योग्य हो, लेकिन सबके नेता को भेजना उचित नहीं है, इसलिए सोच-समझकर ही किसी को भेजना चाहिए।


जामवंत  हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराते हैं कि वे पवन के समान बलवान, बुद्धि और विवेक के भंडार हैं और उनके लिए कोई कार्य कठिन नहीं। यह सुनकर सेवाधर्म के आधार और बल के पुंज हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध होता है और वे विशाल रूप धारण कर रामकाज के लिए तैयार हो जाते हैं।

 कभी-कभी व्यक्ति अपनी शक्ति भूल जाता है, और उचित प्रेरणा मिलने पर वह असंभव कार्य भी कर सकता है।

यही प्रेरणा आचार्य जी इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से सदाचारमय विचार प्रस्तुत कर हम लोगों को दे रहे हैं ताकि हम भी अपनी अन्तर्निहित शक्तियों की अनुभूति कर  राष्ट्र,जो एक चैतन्य महाशक्ति है, के उत्थान में अपना सहयोग दें अन्याय, हिंसा अथवा देशविरोधी गतिविधियों का विरोध करें किन्तु विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर l हम न तो भोग-विलास में अत्यधिक आसक्त होकर अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं को भूल जाएं , और न ही जीवन से विरक्त होकर निष्क्रिय या उदासीन बन जाएं ।

इसके साथ ही आचार्य जी ने प्रेम में विश्वास के महत्त्व को रेखांकित किया 

जगत में प्रेम का आधार बस विश्वास होता है, 

समर्पण युक्त सत्सहयोग उसका श्वास होता है, 

कि यों तो "प्रेम" बहुरंगी नुमाइश सा हुआ फिरता, 

मगर सच, प्रेम में परमात्मा का वास होता है ॥


इसका सार यह है कि प्रेम का आधार विश्वास है विश्वास में शक्ति बुद्धि वैभव नहीं दिखाई देता उसमें समर्पण होता है



नेपाल के राणा जंगबहादुर की चर्चा क्यों हुई अम्बानी की चर्चा क्यों हुई  हमारे स्वभाव का परिचय कैसे कैसे मिलता है संतत्व अधिक व्याप्त होने से क्या हुआ जानने के लिए सुनें