21.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३८

अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हम अनुशासित होकर अपने संगठन को सशक्त बनाएं l


सुन्दर कांड के माध्यम से अब तक हमने जाना कि हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार की राक्षसी विभूतियाँ देखीं स्वर्णमयी प्रासाद और रावण का वैभव देखा, परन्तु उनका मन केवल श्रीरामकार्य में लगा रहा। वे सीताजी की खोज करते हुए अनेक भवनों में गए, किन्तु माता सीता कहीं दिखाई नहीं दीं। इससे वे कुछ क्षण के लिए चिंतित भी हुए, परन्तु श्रीराम का स्मरण कर पुनः उत्साहपूर्वक खोज में लग गए।

अन्ततः वे अशोक वाटिका पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक वृक्ष पर छिपकर देखा कि अनेक राक्षसियों से घिरी हुई माता सीता अत्यन्त दुःखी अवस्था में बैठी हैं। वे कृशकाय हो गई थीं, उनका मन निरन्तर श्रीराम के चरणों में लगा था और वे विरह-वेदना से व्याकुल थीं। उसी समय रावण वहाँ आया और उसने सीताजी को भय, प्रलोभन तथा कठोर वचनों से अपने अधीन करने का प्रयास किया। किन्तु जनकनन्दिनी ने उसे दृढ़तापूर्वक तिरस्कृत कर दिया और श्रीराम के प्रति अपनी अखण्ड निष्ठा प्रकट की l यह सब देखकर हनुमान जी अत्यन्त करुणा और प्रेम से भर गए। उन्होंने विचार किया कि पहले किसी प्रकार माता सीता का भय दूर किया जाए। मुद्रिका देखकर सीताजी का संशय दूर हुआ और उन्हें विश्वास हो गया कि यह श्रीराम के ही दूत हैं।

तब हनुमान जी ने अत्यन्त विनय, करुणा और भक्ति से यह दोहा कहा—

“रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर। अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥”


  हे माता! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथजी का संदेश सुनिए। ऐसा कहकर हनुमान जी प्रेम से गद्गद हो गए। उनके नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया l

हनुमान जी बोले-श्री रामचंद्रजी ने कहा है कि हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गए हैं। वृक्षों के नए-नए कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान है , रात्रि कालरात्रि के समान है , चंद्रमा सूर्य के समान है l

हनुमान जी ने आश्वस्त किया कि राक्षसों के समूह पतंगों के समान और श्री रघुनाथजी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही समझो l

हम भी जब जीवन में अन्याय, भय, निराशा या बाधाओं से घिरते हैं, तब हनुमान जी की भाँति अपने भीतर धैर्य और पराक्रम का भाव जाग्रत कर सकते हैं। यदि हमारा प्रयास सत्य और कल्याणकारी हो, तो विपत्तियाँ स्थायी नहीं रहतीं। हम प्रयास कर रहे हैं शिक्षा,  जो अखंड तेजस,विश्वास, आत्मनिर्भरता है,के माध्यम से संगठित रहने के लिए l समाज और देश के लिए हनुमत् भाव को धारण कर हमें संगठित रहना आवश्यक है l


आचार्य जी ने भैया राघवेन्द्र जी १९७६ , भैया विवेक गुप्त जी १९८५ का उल्लेख क्यों किया, अयोध्या के संत अञ्जनी  नन्दन जी शरण की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l