सीय की दसा बिलोकि विटप असोक तरु,
तुलसी बिलोक्यो सो तिलोक सोक-सारु सो॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७५७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २३९
इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम देशभक्ति को संगठन को महत्त्व दें क्योंकि तभी दुष्ट शक्तियां भयभीत रहेंगी l
हमारे रहते भारत मां कभी निराश, निर्बल या असहाय नहीं रह सकतीं।
जब जीवन में कष्ट, व्यथा, भय या समस्याएँ घेर लेती हैं, तब श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड केवल पाठ नहीं रह जाता, वह आत्मबल जाग्रत करने वाला दिव्य साधन बन जाता है।
सुन्दरकाण्ड में हनुमान् जी का चरित्र हमें सिखाता है कि असम्भव प्रतीत होने वाली बाधाएँ भी भक्ति, साहस और पुरुषार्थ से पार की जा सकती हैं। समुद्र लाँघने से लेकर लंका में प्रवेश, अशोक वाटिका जो तीनों लोकों के दुःखों का सार है,की खोज,मां सीता को आश्वासन, और इसके पश्चात् सम्पूर्ण लंका में अपने तेज का प्रकाश फैलाना — यह सब केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और ईश्वरनिष्ठा का उत्कर्ष है।हनुमान् जी का प्रत्येक प्रयास उल्लास से भरा है। वे निराशा में भी आशा खोजते हैं, संकट में भी धैर्य रखते हैं, और हर क्षण “रामकाज” को ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं।
*राम काज कीन्हे बिनु, मोहि कहाँ विश्राम।*
इसी कारण उनकी सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती चली जाती हैं। जाम्बवान् द्वारा स्मरण कराने पर
*कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥*
*राम काज लगि तव अवतारा*
जो शक्ति प्रकट हुई
*सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥*
वह फिर सीमित नहीं रही — वह प्रभा बनकर चारों ओर फैल गई।
सुन्दरकाण्ड का संदेश यह है कि हमारे भीतर भी हनुमान् जी जैसी अप्रकट शक्तियाँ विद्यमान हैं। जब मन में श्रद्धा, लक्ष्य में पवित्रता और हृदय में सेवा का भाव हो, तब भय और दुःख टिक नहीं सकते।
इसीलिए कहा जाता है कि सुन्दरकाण्ड का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मबल, उत्साह और दिव्य प्रकाश को अपने भीतर जाग्रत करने की साधना है।
तो आइये अपनी भावनाओं की क्षमतानुसार भावों के साथ प्रवेश करें सुन्दर कांड में
*दोहा*
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥
हनुमान् जी की बुद्धि, बल और कुशलता को देखकर जानकी जी ने कहा—
हे तात! अब तुम जाओ। अपने हृदय में श्रीराम के चरणों को धारण करके इस वाटिका के मधुर फल खाओ।
फल खाना एक साधारण कार्य नहीं रह जाता यह अधर्म की लंका में धर्म की निर्भीक उपस्थिति का उद्घोष बन जाता है।
हनुमान् जी सीता जी को सिर नवाकर चले और बाग में घुस गए। फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे। उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया नरेन्द्र शुक्ल जी १९८१ का उल्लेख क्यों किया वास्तव में ब्रह्मास्त्र क्या है जानने के लिए सुनें l