23.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५८ वां* सार -संक्षेप

 जीवन एक अखण्ड यज्ञ है 

यह सच जिसने जान लिया,

और समय पर विधि-विधान 

जिसने विधिवत् पहचान लिया,

वह मनुष्य सत्पुरुष विश्व का

और कर्मयुत योगी है, 

योग कर्मकौशल होता है 

ज्ञाता सतत प्रयोगी है ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४०

 हम जिस कार्य में उत्साह, समर्पण, प्रसन्नता और उत्तरदायित्व का भाव रखेंगे , वही पुरुषार्थ का वास्तविक स्वरूप होगा । पुरुषार्थ केवल कठोर परिश्रम का नाम नहीं, अपितु अपने कर्तव्य को श्रद्धा, संतुलन और आन्तरिक प्रसन्नता के साथ निभाने की जीवन-दृष्टि है।





संसार में अधर्म और अन्याय चाहे जितना बढ़ जाए, ईश्वर कभी भी धर्म और सत्य को असहाय नहीं छोड़ते। वे किसी न किसी रूप में प्रकट होकर संतों, सज्जनों और पीड़ितों की रक्षा करते हैं तथा अधर्म का विनाश कर पुनः धर्म की स्थापना करते हैं l *श्रीरामचरितमानस* में वर्णित यह दिव्य कल्याणकारी विचार आज भी हमें अनेक सांसारिक प्रपंचों, भ्रमों और विपरीत परिस्थितियों के मध्य धैर्य, विश्वास और धर्मनिष्ठा बनाए रखने की प्रेरणा दे रहा है। यह प्रेरणा लेकर हम 

राष्ट्रसेवापरायण बने रहें इसका प्रयास करें यही रामकाज है और जिसे हनुमान् जी ने भी निष्ठापूर्वक निभाया l

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥॥

हम पहुंच गये हैं अशोक वाटिका में 


जब हनुमान् जी ने पर्वत को अपने चरणों से स्पर्श किया, तो वह मानो तुरंत पाताल लोक तक पहुँच गया। उनकी गति इतनी तीव्र थी जैसे भगवान् श्रीराम का अमोघ बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता, वैसे ही हनुमान् जी का कार्य भी अचूक और अटूट होता है। इसी प्रकार वे अत्यंत वेग से अपने कार्य हेतु आगे बढ़ते हैं। आगे हनुमान् जी रावण को स्पष्ट रूप से चेतावनी देते हैं कि भगवान् श्रीराम से वैर करना उचित नहीं है। इसलिए वे कहते हैं कि यदि भलाई चाहते हो तो मां सीता को लौटा दो, जैसा मैंने कहा है।


(जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥)


काजपा की चर्चा क्यों हुई, refugee colony को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने क्या नाम दिया, हनुमान् जी के सहज भाव को तुलसीदास जी ने किस प्रकार व्यक्त किया, अधिवेशन में अपने प्रयोगों का प्रदर्शन क्यों हो जानने के लिए सुनें