24.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७५९ वां* सार

 मानव का ज्ञान अभिमान से भरा हुआ है, 

किन्तु कहता है सदा "अभिमान-शून्य हूँ।"

ज्ञान ध्यान का विधान सारा सुख निज हेतु, 

दर्शाता है कि  मैं परोपकार लीन हूँ।

कैसा मरमारथ रचा है ढोंगी मानव ने, 

सुविधा सुखों में कहता है आत्मलीन हूँ।

सचमुच यदि क्षणभर आत्मदृष्टि मिले, 

लगेगा यही कि मैं न तेरा हूँ न तीन हूँ ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७५९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४१

प्रातःकाल शीघ्र जागरण अत्यन्त आवश्यक है, एक लक्ष्य अवश्य सुनिश्चित करें,  कोई न कोई परोपकार का कार्य भी करें l इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि हम रामकाज के लिए ही  रामालय अर्थात् भारत में जन्मे हैं l 

रामत्व तात्पर्यतः अपने भीतर के तत्त्व को जिसे हम विस्मृत किए रहते हैं को जाग्रत करें l 



श्रीरामचरितमानस केवल कथा नहीं है, उसमें ज्ञान, व्यवहार, नीति, भक्ति, मनोविज्ञान और गहरा जीवनदर्शन समाहित है, जिसे पाने के लिए केवल पाठ नहीं बल्कि खोज की दृष्टि चाहिए।  महात्मा तुलसीदास जी ने प्रत्येक चरित्र और प्रसंग में जीवन के सूत्र छिपाए हैं l मानस हमें सिखाता है कि ज्ञान केवल शास्त्रों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है  व्यवहार में विनम्रता, करुणा और संयम आवश्यक हैं तथा जीवन का सत्य यह है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और संतुलन नहीं छोड़ना चाहिए। जैसे समुद्र-मंथन में अमृत छिपा था, वैसे ही मानस में जीवन का अमृत छिपा है, जिसे श्रद्धा, मनन और अनुभव से खोजने पर ही प्राप्त किया जा सकता है  इसलिए श्रीरामचरितमानस पढ़ने का नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का एक अद्भुत ग्रंथ है l


कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥

जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥


श्रीराम जी अपनी वानर सेना सहित राक्षसों का संहार करके मां सीता को पुनः ले आएँगे। उनका यह पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकों को पावन करने वाला है, जिसका देवता, मुनि और नारद आदि निरन्तर गुणगान करते हैं। जो मनुष्य इस कथा को सुनता, गाता, कहता अथवा आदरपूर्वक स्मरण करता है, वह परम पद अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है। तुलसीदास जी स्वयं को श्रीरघुवीर के चरणकमलों का भ्रमर मानकर यह गान करते हैं।




आजकल हम लोग सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं 

सुन्दरकाण्ड मूलतः हनुमान जी के शौर्य, बुद्धि, भक्ति, सेवा, उत्साह और साधना का काण्ड है। इसमें हनुमान जी केवल दूत नहीं, बल्कि आदर्श साधक के रूप में प्रकट होते हैं। उनके जीवन में आने वाली प्रत्येक बाधा, परीक्षा और संकट उनके उत्साह, श्रद्धा और पुरुषार्थ के आगे मार्ग बन जाता है। समुद्र की विशालता, लंका की दुर्गमता, राक्षसों का भय, मां सीता की खोज की कठिनाई—इनमें से कोई भी उनके लिए रुकावट नहीं बनती, क्योंकि उनका मन प्रभु राम के चरणों में स्थिर रहता है।


सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥

संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥


यह चौपाई हनुमान जी द्वारा रावण को कही गई निर्भीक चेतावनी है।

“हे दशानन! प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि जो श्रीराम से विमुख हो जाता है, उसकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी रामद्रोही की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं।”


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कवितावली का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें