25.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६० वां* सार -संक्षेप

 फूलों की एक वाटिका में

वानर ने देखा सीता को।

जाकर प्रभु का संदेश दिया,

जगजननी कुञ्ज-पुनीता को॥

तब मेघनाद ने जा पकड़ा,

और पूँछ में आग लगा डाली।

उस अग्नि से बजरंगी ने

सब लंका राख बना डाली॥

उस अग्नि से बजरंगी ने

सब लंका राख बना डाली॥

(फिल्म : रेशम की डोरी )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४२

आत्मबोध तिरोहित न होने दें l


वर्तमान समय की परिस्थितियाँ अत्यन्त विषम और चुनौतीपूर्ण प्रतीत हो रही हैं। अनेक प्रकार की दुष्ट शक्तियाँ भारत की एकता, उसकी परम्पराओं और उसके आत्मबोध को दुर्बल करने का  कुत्सित प्रयास कर रही हैं। ऐसे समय में ऐसे हम सभी लोगों का सजग, संगठित और सक्रिय रहना अत्यन्त आवश्यक है, जिनके जीवन में सात्त्विकता, नैतिकता, सनातन मूल्यों तथा भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा विद्यमान है।

सनातन संस्कृति अद्भुत है यह केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि जीवन को सत्य, करुणा, संयम, कर्तव्य और लोकमंगल की दिशा में ले जाने वाली चेतना है। इसलिए हमारे जैसे लोग जो हिन्दुत्व के व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप का अवबोध रखते हैं, उनका दायित्व केवल स्वयं तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि समाज में आशा, आत्मविश्वास और एकात्मता का संचार करना भी कर्तव्य बन जाता है।

समाज जब संगठित रहता है, तब वह किसी भी संकट का धैर्यपूर्वक सामना कर सकता है। संगठन केवल संख्या का समूह नहीं, बल्कि हृदयों की एकता, उद्देश्य की स्पष्टता और परस्पर विश्वास का नाम है। यदि समाज के सज्जन, सात्त्विक और राष्ट्रनिष्ठ लोग जो इसी प्रकार ही कहते हैं कि 

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।

 एक-दूसरे से संयुत रहेंगे तो निराशा,हताशा, भय आदि स्वतः दूर होने लगेंगे। संगठित समाज में आत्मबल जाग्रत होता है, और वही आत्मबल राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बनता है।तुलसीदास जी ने भी लोकभाषा में श्रीरामचरितमानस की रचना करके समाज को एक सूत्र में बाँधने का महान् कार्य किया।इसी के सुन्दर कांड में हम लोग आजकल प्रविष्ट हैं  जिसमें हनुमान् जी का लंका दहन वाला प्रसंग चल रहा है l हनुमान् जी द्वारा लंका दहन केवल क्रोध या प्रतिशोध की घटना नहीं थी, बल्कि वह अधर्म, अहंकार और अन्याय के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक चेतावनी भी थी। रावण की लंका बाहरी वैभव से सम्पन्न थी, किन्तु वहाँ धर्म, करुणा और मर्यादा का अभाव होता जा रहा था। शक्ति का उपयोग लोकमंगल के स्थान पर अहंकार और अत्याचार के लिए किया जा रहा था।

जब हनुमान् जी सीता की खोज में लंका पहुँचे, तब उन्होंने पहले शान्ति और नीति का मार्ग अपनाया। उन्होंने रावण को अप्रत्यक्ष रूप से समझाने का प्रयास किया कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटाकर भगवान् राम से वैर त्याग दे। परन्तु रावण ने न केवल इस नीति को अस्वीकार किया, बल्कि दूत का अपमान भी किया। विभीषण जैसे सज्जन की बात भी नहीं सुनी जा रही थी।

इसी कारण 

“साधु अवग्या कर फलु ऐसा।

जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥”


लाइ-लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ,


लघु ह्वै निबुकि गिरि मेरूतें बिसाल भो।


कौतुकी कपीसु कुदि कनक-कँगूराँ चढ्यो,

 

रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो।।



हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥


जब हनुमान् जी की पूँछ में अग्नि लगाई गई, तब भगवान् की प्रेरणा से उनचासों प्रकार की वायु चलने लगीं। उन प्रचण्ड वायुओं के कारण अग्नि और अधिक फैल गई। उसी समय हनुमान् जी ने प्रबल अट्टहास किया, गर्जना की और आकाश में विशाल रूप धारण कर लंका दहन करने लगे।


जब कोई कार्य धर्म, सत्य और लोकमंगल के लिए होता है, तब सम्पूर्ण प्रकृति भी उसकी सहायक बन जाती है। हनुमान् जी का पराक्रम केवल व्यक्तिगत शक्ति नहीं था, वह ईश्वरीय प्रेरणा से सम्पन्न था।

“मरुत उनचास” केवल भौतिक वायु नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि जब धर्मशक्ति जाग्रत होती है, तब अनेक दिशाओं से सहयोग मिलने लगता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया मनोज अवस्थी जी,  भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें