प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७६१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४३
यदि हम पुनः अपने महान् ग्रन्थों की ओर लौटें, उनका अध्ययन, मनन और आचरण करें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश आएगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी पुनः उसी गौरव, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना की ओर अग्रसर हो सकेगा, जिसने कभी भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया था।
भारत वह दिव्य भूमि है जहाँ मानव जीवन को केवल भोग और उपार्जन का साधन न मानकर, आत्मोन्नति, लोकमंगल और परम सत्य की प्राप्ति का माध्यम माना गया। यहाँ के ऋषियों ने तप, साधना और अनुभूति के द्वारा ऐसे ज्ञान का प्रकाश किया, जिसने मनुष्य को केवल बाह्य उन्नति ही नहीं, बल्कि अन्तर्मन की जागृति का मार्ग भी प्रदान किया।हमारे समक्ष भारत के इसी दिव्य ज्ञान-परम्परा का आधार हमारे अत्यन्त प्रेरणादायक, प्रभावोत्पादक और भक्तिरस से ओतप्रोत ग्रन्थ जैसे वेद, उपनिषद्, पुराण,श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, कवितावली उपलब्ध हैं l ये ग्रन्थ हमारे भीतर आत्मबोध, साहस, पुरुषार्थ, करुणा, भक्ति और जीवन के उच्च आदर्शों का जागरण करते हैं।
किन्तु विडम्बना यह है कि हम इन अमूल्य ज्ञानस्रोतों से विमुख होकर ऐसी शिक्षा की ओर अधिक आकर्षित हो गए हैं, जो प्रायः केवल नौकरी प्राप्त करने तक सीमित रह गई है। यह शिक्षा हमें बाह्य साधनों की ओर तो ले जाती है, परन्तु अनेक बार हमें हमारे अन्तर्मन की शक्ति, आत्मचेतना, स्वाभिमान और पराक्रम से दूर कर देती है।यदि हम अपने जीवन में इन दिव्य ग्रन्थों के विचारों का मनन करे, तो उसमें केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक, तेजस्वी और लोकमंगलकारी बनाने की प्रेरणा भी जाग्रत हो सकती है। लोकमंगल अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इस समय परिस्थितियां अत्यन्त विषम हैं ऐसे में हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए बिना ईर्ष्या द्वेष के सत्पुरुषों को संगठित करें और कापुरुषों का निरसन करें l विकारों को दूर कर सद्विचारों को ग्रहण करें तो आइये सद्विचारों को ग्रहण करने के लिए प्रवेश करें लंका में
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥
हनुमान् जी सोचने लगे—
“यह लंका तो राक्षसों का निवासस्थान है। यहाँ सज्जनों का वास भला कहाँ हो सकता है?”
वे अपने मन में यही तर्क-वितर्क कर ही रहे थे कि उसी समय विभीषण जाग उठे।
ईश्वर की व्यवस्था में कभी भी सत्पुरुषों का पूर्ण अभाव नहीं होता।
अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में भी कहीं न कहीं सत्य, भक्ति और धर्म का दीपक जलता रहता है।
आइये उस प्रसंग में पहुंच जाएं जब विभीषण नीति का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि दूत का वध अधर्म है।
यह सुनकर रावण अपना आदेश बदल देता है और कहता है—
“वानर को उसकी पूँछ अत्यन्त प्रिय होती है, अतः इसकी पूँछ में आग लगा दो।”
इसके पश्चात्
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥3॥
जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम,
नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै।
मातु! कृपा कीजे, सहिदानि दीजै, सुनि सीय
दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै॥
कहा कहौं तात! देखे जात ज्यौं बिहात दिन,
बड़ी अवलंब ही,सो चले तुम्ह तोरि कै।
'तुलसी' सनीर नैन, नेहसो सिथिल बैन,
बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै॥
हनुमान् जी लंका जलाकर, समुद्र में अपनी पूँछ की अग्नि बुझाकर, माता सीता के पास आते हैं। वे सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर विनम्र भाव से खड़े हो जाते हैं और कहते हैं—
“माता! अब मुझे विदा दीजिए, कृपा कर कोई पहचान और संदेश दीजिए।”
यह सुनकर सीता माता उन्हें आशीर्वाद देती हैं और अपनी चूड़ामणि उतारकर श्रीराम के लिए पहचानस्वरूप प्रदान करती हैं।
फिर अत्यन्त करुण स्वर में कहती हैं—
“पुत्र! क्या कहूँ? तुम्हें जाते देखकर ऐसा लगता है जैसे दिन ही समाप्त हो रहा हो। तुम ही तो मेरे बड़े सहारे थे, और अब तुम भी जा रहे हो।”
तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता माता की आँखें आँसुओं से भरी थीं, प्रेम के कारण उनकी वाणी मन्द और कम्पित हो रही थी। उनकी व्याकुल दशा देखकर हनुमान् जी भी अत्यन्त विनीत होकर उन्हें धैर्य देने लगे।
इसके अतिरिक्त भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया मोहन जी भैया पवन जी भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें