जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥2॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष चतुर्दशी /पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७६५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४७
जो हमारे भीतर मनमन्दिर में स्थित है उसके पास अवश्य बैठें l
हमारे जीवन में सांसारिकता और आध्यात्मिकता — दोनों का समान महत्त्व है। विद्या और अविद्या के मध्य संतुलन आवश्यक है।
यहाँ अविद्या का तात्पर्य अज्ञान से नहीं, अपितु संसार के व्यवहार, कर्म, जीविका, परिवार, समाज, विज्ञान तथा व्यवस्था आदि से है। विद्या का अर्थ आत्मज्ञान, ब्रह्मचिन्तन, ईश्वरभक्ति और आध्यात्मिक बोध है।
अतः मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसमें वह अपने सांसारिक कर्तव्यों का भी सम्यक् पालन करे और साथ ही अपने अन्तःकरण को परमात्मा से संयुत रखे। कर्म और अध्यात्म का यही समन्वय जीवन को संतुलित एवं सार्थक बनाता है।
जब कर्म हम पुरोहितों के लिए राष्ट्र के लिए जाग्रत रहने का होता है तथा जब कर्म समाजोन्मुखी भाव से किया जाता है, तब वही धर्मस्वरूप हो जाता है। ऐसा धर्म मनुष्य को पतन से बचाकर उसे सदैव सत्य, मर्यादा और कल्याण के पथ पर अग्रसर रखता है।
हमारे समाज के जो लोग पथभ्रष्ट हो गए हैं, उन्हें हम पुनः सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करेंगे और जो जान-बूझकर समाज तथा राष्ट्र को विपथगामी बनाने का प्रयास करेंगे, उनका दृढ़तापूर्वक प्रतिकार भी करेंगे l इसके लिए संगठन अत्यन्त आव्श्यक है l भगवान् राम ने यही किया l
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥33॥
जिस व्यक्ति पर प्रभु श्रीराम की कृपा हो जाती है, उसके लिए संसार में कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता। प्रभु की कृपा के प्रभाव से अत्यन्त दुर्बल वस्तु भी असाधारण कार्य कर सकती है; जैसे रुई सामान्यतः अग्नि में जल जाती है, किन्तु प्रभु की शक्ति से वही रुई समुद्र के भीतर स्थित प्रचण्ड बड़वानल को भी जला सकती है।
हम प्रविष्ट हैं सुन्दर कांड में
लंका-दहन, सीताजी का सन्देश प्राप्त करने तथा अपना कार्य पूर्ण करके हनुमानजी श्रीराम के समक्ष उपस्थित होते हैं। श्रीराम उनकी सेवाभावना से अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें वर माँगने के लिए कहते हैं। तब हनुमानजी भक्ति का वरदान माँगते हैं
“हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे अपनी ऐसी भक्ति प्रदान कीजिए जो परम सुखदायिनी हो और कभी मुझसे दूर न हो।”
हनुमानजी के अत्यन्त सरल, निष्काम और निष्कपट वचन सुनकर श्रीराम ने प्रसन्न होकर कहा— “एवमस्तु”, अर्थात् “ऐसा ही हो।”
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, युगभारती के प्रथम अध्यक्ष स्व भैया राजेश जी का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया तुलसीदास जी *उहां* कब कहते हैं और *इहां* कब जानने के लिए सुनें