4.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७३९ वां* सार -संक्षेप

 कहाँ कब कौन क्या कुछ कर रहा इसकी न हो चिन्ता, 

यहाँ अब क्या मुझे करना यही अपना सुचिंतन हो ,

जगत जंजाल झंझट या समस्या है न  उलझें हम

कि, अपने आत्मदर्शन के लिए दिनरात मंथन हो। 

शरीरी शक्ति मन की भक्ति बौद्धिक ज्ञान  का साधन, 

इसी के हित सतत चिंतन मनन युत कर्म अनुवर्तन ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७३९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२१


हम आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान शक्ति भक्ति विचार वैराग्य और संसार में संघर्ष करने की क्षमता प्रदान करें उनका मार्ग प्रशस्त करें

 ( वाचक ! प्रथम सर्वत्र ही ‘जय जानकी जीवन’ कहो,

फिर पूर्वजों के शील की शिक्षा तरंगों में बहो।

दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो,

होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।। )


शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, अपितु संस्कारों का प्रसार करने वाली एक अद्भुत शक्ति है। उसका व्यक्तित्व, उसके विचार और उसके भीतर निहित विश्वास मिलकर एक ऐसी ज्योति का निर्माण करते हैं, जो स्वयं जलकर भी दूसरों के जीवन को आलोकित करती रहती है। शिक्षक अपने आचरण, वाणी और व्यवहार के माध्यम से शिष्य के अंतःकरण में सत्य, सदाचार, अनुशासन और कर्तव्यबोध के बीज रोपित करता है। यह प्रक्रिया केवल सूचना या पाठ्य सामग्री के संप्रेषण तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन-दृष्टि का निर्माण करती है।

भारत की प्राचीन शिक्षा प्रणाली में शिक्षक का स्थान अत्यंत उच्च और पूजनीय माना गया है। गुरुकुल परम्परा में गुरु केवल विषय-विशेषज्ञ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक होते थे। वे शिष्य को ज्ञान के साथ-साथ संयम, सेवा, विनम्रता, आत्मनियंत्रण और लोकमंगल की भावना का अभ्यास कराते थे। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास और आत्मबोध था। वर्तमान समय की शिक्षा विकृत है आज की शिक्षा का एक बड़ा भाग मनुष्य को यंत्रवत् बना देने की प्रवृत्ति से प्रभावित दिखाई देता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि शिक्षा का केन्द्र धीरे-धीरे ज्ञान और संस्कार से हटकर केवल रोजगार, प्रतिस्पर्धा और परिणामों पर आ गया है। विद्यार्थी को एक जीवंत, संवेदनशील और सृजनशील व्यक्तित्व के रूप में विकसित करने के स्थान पर उसे सूचना एकत्र करने और निर्धारित ढाँचे में कार्य करने वाली इकाई के रूप में तैयार किया जा रहा है।इसमें हमारी परम्परा का कोई ध्यान नहीं रखा गया इस शिक्षा में सुधार की नितान्त आवश्यकता है 

प्राचीन भारतीय शिक्षा की विलक्षणता इसी में निहित थी कि उसमें ज्ञान और संस्कार का अद्भुत समन्वय था। गुरु अपने शिष्यों को केवल शास्त्रों का बोध नहीं कराते थे, बल्कि उन्हें जीवन के आदर्शों से भी परिचित कराते थे। शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में, सरल और अनुशासित वातावरण में दी जाती थी, जहाँ जीवन के प्रत्येक कर्म में नैतिकता और आध्यात्मिकता का समावेश रहता था।


वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, रामायण, गीता आदि भारतीय ज्ञानपरम्परा के प्रमुख आधारस्तम्भ हैं। इन ग्रन्थों में केवल धार्मिक या दार्शनिक विचार ही नहीं, बल्कि जीवन के समग्र विकास का मार्ग निहित है।


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