31.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (अधिक पूर्णिमा ) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 31 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६६ वां* सार

 रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥

कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥3॥


सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (अधिक पूर्णिमा ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 31 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४८

हम तत्त्व, शक्ति की अनुभूति करें आत्मबोधोत्सव आनन्द प्रदान करता है l 



भारतभूमि के सम्मुख चुनौतियाँ नई नहीं हैं। युगों से अधर्म, अत्याचार और विघटनकारी शक्तियाँ विभिन्न रूपों में उसे घेरने का प्रयास करती रही हैं। कभी वे रावण के अहंकार के रूप में प्रकट हुईं, कभी हिरण्यकशिपु के दुराग्रह के रूप में, कभी बाह्य आक्रमणों के रूप में और कभी समाज के भीतर उत्पन्न विकारों के रूप में। यह विष आज भी अवसर पाते ही फुंकारने लगता है। इसलिए वर्तमान समय का भी यही आह्वान है कि समाज जाग्रत रहे, अपने विवेक, संस्कृति और धर्मनिष्ठा की अग्नि को प्रज्वलित रखे l रावणत्व और रामत्व हमारे भीतर विद्यमान दो प्रवृत्तियों के भी प्रतीक हैं। रावणत्व तब प्रकट होता है जब हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार और स्वार्थ के अधीन हो जाते हैं । ये विकार धीरे-धीरे मन, बुद्धि और व्यवहार में समा जाते हैं तथा हमारे निर्णयों को प्रभावित करते हैं। जब अनेक व्यक्तियों के भीतर यही प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं, तब उनका प्रभाव पूरे समाज पर भी पड़ता है और सामाजिक जीवन में कलह, अन्याय तथा अव्यवस्था का विस्तार होने लगता है।

इसके विपरीत रामत्व सत्य, धर्म, मर्यादा, करुणा, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा, शौर्य, पराक्रम,आत्मसंयम, विनम्रता, सेवा और लोकमंगल की भावना का नाम है। रामत्व मनुष्य को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय और सदाचार के मार्ग पर चलना सिखाता है। 

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में रामत्व और रावणत्व दोनों की संभावनाएँ विद्यमान रहती हैं। मनुष्य को अपने विवेक, सद्बुद्धि और धर्मबोध का आश्रय लेकर यह निर्णय करना होता है कि वह किस मार्ग का अनुसरण करेगा। जब वह सत्य, मर्यादा और कर्तव्य का चयन करता है, तब उसके भीतर का रामत्व पुष्ट होता है; और जब वह विकारों तथा अहंकार के वशीभूत होता है, तब रावणत्व प्रबल हो जाता है । श्रीरामचरित मानस (राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस विशेष जाना तिन्ह नाहीं॥), जिसमें कथा के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी ने पूरा दिशा निर्देश कर दिया, का संदेश  अपने भीतर के रावणत्व पर विजय प्राप्त कर रामत्व को स्थापित करने का संदेश है। यही व्यक्ति के उत्थान, समाज के कल्याण और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का आधार है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने औरास के विद्यालय की चर्चा क्यों की, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ, नर से भारी नारी किसने कहा था, आचार्य जी ने *गीत मैं लिखता नहीं हूं* की किस कविता की आज चर्चा की,मन्दोदरी के साथ माया बहन का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें