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प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४९

आत्मविधान का दर्शन करते हुए जीवन में चलें 

जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप, अपने कर्तव्य, अपने मूल्यों और जीवन के परम लक्ष्य को समझकर चलता है, तभी उसका जीवन सार्थक, संतुलित और प्रकाशमय बनता है।



जिस व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ संस्कार प्रवेश कर जाते हैं, उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व रूपान्तरित हो जाता है। भक्ति के संस्कार, सद्विचारों के संस्कार, उत्तम व्यवहार के संस्कार तथा सत्त्व, रजस् और तमस् जैसी प्रवृत्तियों को संतुलित करने वाले संस्कार मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं मनुष्य की महानता उसके पद, धन या बाह्य वैभव से नहीं, अपितु उसके संस्कारों की उत्कृष्टता से मापी जाती है। जिस व्यक्ति में जितने उच्च और पवित्र संस्कार होते हैं, वह उतना ही महान् होता है।

संस्कार विचारों का आधार होते हैं, चरित्र की नींव होते हैं और व्यवहार की शोभा होते हैं। संस्कार ही विचारों को दिशा देते हैं, भावनाओं को परिष्कृत करते हैं तथा आचरण को मर्यादित और आदर्श बनाते हैं।


अतः संस्कार मानव जीवन की वह अमूल्य निधि है, जो साधारण व्यक्ति को असाधारण बना सकती है और मनुष्य को मनुष्यता की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है

किसी राष्ट्र की वास्तविक संस्कृति उसके साधारण नागरिकों के दैनिक आचरण में प्रतिबिम्बित होती है।

संस्कृति केवल ग्रन्थों, भवनों, कला-कृतियों या उत्सवों का नाम नहीं है। किसी समाज के सामान्य व्यक्ति का दैनिक व्यवहार, बोलचाल, शिष्टाचार, पारिवारिक सम्बन्ध, अतिथि-सत्कार, बड़ों के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण तथा नैतिक आचरण—ये सभी मिलकर उसकी संस्कृति को प्रकट करते हैं।


श्रीरामचरितमानस संस्कारों का अक्षय भण्डार है। यह मनुष्य को भक्ति, विनय, मर्यादा, सेवा, त्याग, कर्तव्य और सदाचार का पाठ पढ़ाता है।


पठए बालि होहिं मन मैला।

भागौं तुरत तजौं यह सैला॥

बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ।

माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥


सुग्रीव ने सोचा—

"यदि ये मन के कपटी और दुष्ट बालि द्वारा भेजे गए हों, तो मैं तुरन्त इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ।"

सुग्रीव की यह बात सुनकर हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण करके उन दोनों राजकुमारों के पास गए और मस्तक झुकाकर विनम्रतापूर्वक पूछने लगे।

हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥ आदि 

 इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज सुन्दर कांड के उस प्रसंग का उल्लेख किया  जब विभीषण, जिसमें संस्कार प्रविष्ट हैं,रावण को समझा रहे हैं 

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39क॥

हे दशानन! मैं बार-बार आपके चरणों में पड़कर विनती करता हूँ कि आप अपने अभिमान, मोह और घमण्ड का त्याग कर दें और अयोध्यापति श्रीराम का आश्रय ग्रहण करें।

किन्तु रावण को समझ में नहीं आता l

इसके अतिरिक्त देशदर्शन में उदयपुर की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की,परान्तर कोविद कौन हैं,हम सम्मान के पात्र कैसे हो सकते हैं,इंदौर की महान् महारानी अहिल्याबाई होल्कर का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l