5.5.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७४० वां* सार -संक्षेप

 "विजय"  विश्वास संयम शौर्य विक्रम की कहानी है, 

मनुज के आत्मबल पुरुषार्थ की मंगल कहानी है, 

उठो जागो जगाओ भीत व्याकुल भ्रमित  मानस को, 

"विजय" पुरुषार्थमय अध्यात्म की अद्भुत निशानी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 मई  2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७४० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२२


सच्ची विजय केवल बाहरी सफलता नहीं, बल्कि विश्वास, संयम, शौर्य और पुरुषार्थ से प्राप्त होने वाली आन्तरिक शक्ति है। हम इससे प्रेरणा लेकर अपने आत्मबल को पहचानकर भय और भ्रम से ग्रस्त राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को जाग्रत करें



आजकल हम लोग श्री रामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में प्रविष्ट हैं 

भगवान् राम जी और लक्ष्मण जी की भेंट हनुमान जी से होती है, जो उन्हें सुग्रीव के पास ले जाते हैं। सुग्रीव अपने भाई बालि से पीड़ित होता है, इसलिए भगवान् राम उसकी सहायता करने का वचन देते हैं।

वे बालि का वध करके सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य दिलाते हैं।

अब आगे 


इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा॥

निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा॥1॥


यहाँ  सचिव पवनपुत्र हनुमान जी अपने हृदय में विचार करते हैं कि राजा सुग्रीव  भगवान् राम जी का कार्य ( मां सीता की खोज) भूल गए हैं 

तब हनुमान जी सुग्रीव के पास जाते हैं, उनके चरणों में सिर झुकाते हैं और उन्हें चार प्रकार की नीति (साम, दाम, दण्ड, भेद) से समझाते हैं।

इस प्रसंग में हनुमान जी की बुद्धिमत्ता, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा प्रकट होती है। वे जानते हैं कि सुग्रीव राज्य और सुख-सुविधाओं में लीन होकर अपने वचन को भूल गए हैं, इसलिए वे सीधे कठोरता नहीं दिखाते, बल्कि नीति के चारों उपायों का सहारा लेकर उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण कराते हैं।

सुग्रीव को अपनी भूल का बोध होता है। वे तुरंत सक्रिय होकर रामकाज  के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं।


इसके अतिरिक्त भैया पुनीत श्रीवास्तव जी आचार्य जी से कहां भेंट कर रहे हैं,

हाल में  भारत के पाँच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों—पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी—में जो विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए इनके परिणामों के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा,दीनदयाल जी किस प्रकार के चुनाव चाहते थे जानने के लिए सुनें l