बहुत दिनों के बाद अँधेरा छँटा सूर्य की किरण दिखी है,
बहुत दिनों के बाद भक्ति ने शक्ति लिखी है,
बहुत दिनों बाद शान्ति को क्रान्ति सुहायी,
बहुत दिनों के बाद पड़ा " श्रीराम " सुनायी---------॥
जगो सुप्त सौभाग्य बंगभू के पुरषारथ
जगो जवानी पूर्व तपस्या हो न अकारथ ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७४१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२३
“मानस प्रच्छालन” अर्थात् मानसिक शुद्धि के लिए डायरी लेखन एक सरल, प्रभावी और आवश्यक उपाय है, जो हमें आंतरिक शांति और आत्मिक संतुलन प्रदान करेगा ही l अतः डायरी लेखन अवश्य करें l
गोस्वामी तुलसीदास जी ने उस काल में श्री रामचरितमानस की रचना की, जब दुष्ट अकबर का शासन था। उस समय सनातनधर्मी समाज अनेक प्रकार की कठिनाइयों से गुजर रहा था। धार्मिक आस्थाओं में शिथिलता आ रही थी, परम्पराएँ कमजोर पड़ रही थीं और लोगों के मन में भय तथा भ्रम का वातावरण व्याप्त था। समाज में एकता का अभाव भी स्पष्ट दिखाई देता था।
ऐसी स्थिति में तुलसीदास जी ने रामकथा के माध्यम से लोगों के भीतर धर्म, मर्यादा और आस्था का पुनर्जागरण करने का प्रयास किया। उन्होंने सरल और लोकभाषा में रचना करके जनसाधारण तक आदर्श जीवन मूल्यों का संदेश पहुँचाया। इस प्रकार रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि उस समय के समाज को दिशा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण साधन बन गया l
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥
जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥
वर्तमान में भी परिस्थितियां अत्यन्त विषम हैं अनेक राक्षस अपने स्वार्थ के लिए सत्य, धर्म और मर्यादा का त्याग कर समाज में भय, अशांति, विभाजन फैलाने का काम कर रहे हैं वे विभिन्न रूप धारण कर लोगों के बीच अविश्वास, ईर्ष्या और शत्रुता को बढ़ा रहे हैं हमें ऐसे लोगों से सचेत रहने की आवश्यकता है
हम रामत्व की अनुभूति करें हम भावों को सरल बनाएं, विचारों को प्रखर करें और कर्म के प्रति ऐसी निष्ठा रखें कि सामान्य अवरोध भी हमें विचलित न कर सकें।
व्यक्तिगत लाभ लोभ को समाजोन्मुख करें l
भैया प्रमेन्द्र श्रीवास्तव जी द्वारा प्रेषित किस video clip की आचार्य जी ने चर्चा की, बैलगाड़ी के आगे शुनी के चलने का क्या प्रसंग है, मलमूत्र की धारा से क्या तात्पर्य है, कल आचार्य जी कहां रहे,पर्यङ्क क्या है, किष्किन्धा कांड में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l