दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शाठ्यं सदा दुर्जने
प्रीति: साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जनेष्वार्जवम्।
शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता
ये चैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थिति:॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 मई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७४२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २२४
अपने देश की अद्भुत परम्परा से भावी पीढ़ी को अवगत कराएं उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म का महत्त्व समझाएं
दीर्घकाल से ये सदाचार वेलाएं निरन्तर चल रही हैं, जिनका प्रारम्भ विद्यालय से हुआ था। इनके शिक्षाप्रद विचारों को सुनकर हम उत्तम संस्कार एवं सद्विचार ग्रहण कर रहे हैं, जिससे हमारे व्यक्तित्व का समुचित विकास हो रहा है । साथ ही आचार्य जी यह भी प्रयास कर रहे हैं कि हम इस प्रकार से प्रेरित हों कि हमारा जीवन समाजोन्मुख तथा राष्ट्रोन्मुख बनकर समाज और राष्ट्र की उन्नति में सार्थक योगदान दे सके। हमारे लिए समय के सदुपयोग का यह एक श्रेष्ठ माध्यम बन गया है l
इस सृष्टि में एक अद्भुत और रहस्यमयी व्यवस्था निरन्तर संचालित हो रही है, जिसे मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से पूर्णतः समझ नहीं पाता। संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके पीछे ईश्वर की अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी भाव को व्यक्त करते हुए कहा है
“उमा दारु जोषित की नाईं।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥”
अर्थात् जैसे कोई कठपुतली संचालक लकड़ी की कठपुतलियों को अपनी इच्छा से नचाता है, उसी प्रकार भगवान् समस्त प्राणियों और इस जगत् का संचालन कर रहे हैं। मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, किन्तु वास्तविक नियन्ता परमात्मा ही है। यह भारतीय संस्कृति और भारतीय मनीषा की अद्भुत चिन्तन दृष्टि है l हम भी उसी परमात्मा के अंश हैं। ईश्वर की चेतना प्रत्येक जीव में विद्यमान है, इसलिए मनुष्य केवल शरीर नहीं, अपितु दिव्य चेतना का धारक है। जब मनुष्य अपने भीतर स्थित उस ईश्वरीय तत्त्व को पहचानता है, तब उसका जीवन सत्य, करुणा, सदाचार और आत्मबोध की दिशा में अग्रसर होता है।
न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म: न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
यह है सनातन चिन्तन हिन्दू चिन्तन किन्तु जब इस चिन्तन से शक्ति पराक्रम पौरुष वेग इन्द्रिय सामर्थ्य विलग होने लगता है तब यह एकांगी हो जाता है और हमारे देश के साथ ऐसा कई अवसरों पर हुआ l
राजा जनक जैसे ज्ञानी , राजा दशरथ और बालि जैसे पराक्रमी राजा उस समय विद्यमान थे, फिर भी रावण का आतंक बढ़ता गया l भगवान् श्रीराम का प्राकट्य इसी कारण विशेष माना गया कि उन्होंने अध्यात्म, मर्यादा, करुणा और शौर्य—इन सभी का समन्वय कर धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की l ऐसी अद्भुत परम्परा है हमारे देश की l इसी पर आधारित शिक्षा की आवश्यकता है l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भर्तृहरि की चर्चा क्यों की अभिनेता से नेता बने विजय का उल्लेख क्यों हुआ किष्किन्धा कांड में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l