फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,
फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आई भर,
वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत,—
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,....
मां सीता की स्मृति भगवान् श्रीराम के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत बनती है। क्षणभर पहले जो मन निराशा और चिन्ता से घिरा था, वह पुनः उत्साह, आत्मविश्वास और विजय-संकल्प से भर उठता है। दिव्य बाणों का स्मरण उनके पराक्रम और युद्ध-सामर्थ्य के पुनर्जागरण का प्रतीक है।
(*राम की शक्ति -पूजा* से )
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७७५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५७
मानस एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जो हमें मार्गदर्शन देता है इसके आधार पर हम भावी योजनाएं बनाएं l उनमें हम निश्चित रूप से सफल होंगे क्योंकि हनुमान जी हमारे साथ हैं l
आजकल हम लोग कल्याणार्थ सुन्दर कांड के पाठ में प्रविष्ट हैं
मनुष्यत्व के अनुभव में पारंगत भगवान् श्रीराम समुद्र पार कर लंका पहुँचने के उपाय पर विचार कर रहे हैं। वे सुग्रीव और विभीषण से परामर्श लेकर यह आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि बुद्धिमान और महान् व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण कार्यों में अपने सहयोगियों के परामर्श का सम्मान करते हैं। साथ ही, समुद्र की विशालता और दुर्गमता आगामी चुनौती की गंभीरता को प्रकट कर रही है।
विभीषण ने समुद्र से मार्ग माँगने का उचित उपाय बताया। लक्ष्मण जी,
(जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते) ऐसे कि जो संसार में जितने भी राक्षस हैं, उन सबको एक पल में नष्ट कर सकते हैं,को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा कि आपके बाण करोड़ों समुद्रों को भी सुखाने की शक्ति रखते हैं तो समुद्र से याचना करने की आवश्यकता नहीं है l
किन्तु मर्यादा और नीति यही कहती है कि पहले विनम्रता और उचित उपाय का आश्रय लिया जाए। इसलिए भगवान् श्रीराम समुद्र के तट पर जाकर उसका सम्मान करते हुए मार्ग देने की प्रार्थना करने लगे।
कथा में आगे शुक और सारण का उल्लेख हुआ है l
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥52॥
लक्ष्मणजी ने दूतों से कहा
उस मूर्ख रावण से मेरा यह उदार और हितकारी सन्देश स्पष्ट शब्दों में कह देना कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दे और आकर मैत्री स्थापित कर ले। यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो समझ ले कि उसका विनाशकाल निकट आ पहुँचा है।
इसके अतिरिक्त गुप्तसार संग्रह का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि कुश के आसन पर बैठने से ज्ञान की वृद्धि होती है (यह ऊर्जा के क्षय को रोकता है। इस पर बैठकर पूजा, ध्यान या जप करने से अर्जित ऊर्जा धरती में नहीं जाती। यह मन की एकाग्रता बढ़ाता है और कामनाओं की तत्काल पूर्ति में सहायक होता है )l
भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें