गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥
जो साक्षात् कमलनाभ भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) के मुखकमल से प्रकट हुई है , उसी श्रीमद्भगवद्गीता का भली-भाँति गायन और अध्ययन करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन? अर्थात्, जो ज्ञान स्वयं भगवान के मुख से निकला हो, वह सम्पूर्ण वेदों और शास्त्रों का सार है, इसलिए उसी का अभ्यास सर्वोपरि है।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७८० वां* सार -संक्षेप
स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लखनऊ
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६२
भारतवर्ष की विलक्षण आर्ष परम्परा को गहराई से जानने का प्रयास करें l सन्मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते रहें l
इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम आत्मविश्वास की यह अनुभूति करें कि हम जीव ईश्वर का अंश हैं (सोऽहम् ) किन्तु नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध, चेतन, अविनाशी और आनन्दस्वरूप आत्मा हैं, हमारे अन्तःकरण में प्रेम, आत्मीयता, सदाचारमय विचार, राष्ट्रभक्ति, समाज सेवा का भाव प्रविष्ट हो सके, हम अच्छे-बुरे में भेद करके अच्छाई को ग्रहण करें और बुराई को छोड़ दें,हम प्रयास करें कि हमारे सभी राष्ट्रभक्त बन्धु सुखी हों, सभी रोगमुक्त और स्वस्थ रहें, सभी का जीवन मंगलमय हो तथा सभी को शुभ और कल्याणकारी वस्तुओं का दर्शन हो। किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
आचार्य जी ने श्रीरामचरितमानस की भी चर्चा की l
इसके अतिरिक्त बूजी जी, बैरिस्टर साहब, दीनदयाल जी, भैया शशि शर्मा जी, भैया अरविन्द जी,
महाराजा देवी सरस्वती शिशु मन्दिर तिलक नगर कानपुर का उल्लेख क्यों हुआ, किन भैया ने अष्टावक्र गीता और श्रीमद्भगवद्गीता में भेद जानना चाहा,जालिम सिंह की चर्चा क्यों हुई, युद्ध कांड और लंका कांड में अन्तर क्या है जानने के लिए सुनें l