15.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अमावस्या, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अमावस्या, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८१ वां* सार -संक्षेप


स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लक्ष्मणपुरी


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६३


ईश्वर ने इस संसार को जड़ और चेतन पदार्थों सहित गुण और दोष दोनों से युक्त बनाया है l हम संसार में रहते हुए गुणों को ग्रहण करें और दोषों का त्याग करें l राष्ट्रोन्मुखी समाजोन्मुखी रहते हुए अपनी भूमिका को पहचानकर उसके अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करें l



भारतीय दर्शन में संसार को अनित्य और क्षणभंगुर कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार असत्य है, बल्कि यह कि इसकी सभी वस्तुएँ परिवर्तन के अधीन हैं। परिवर्तन ही संसार का नियम है। जो इस सत्य को समझ लेता है, वह सुख में अत्यधिक आसक्त नहीं होता और दुःख में निराश नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि दोनों अवस्थाएँ स्थायी नहीं हैं।

यही कारण है कि महापुरुष संसार में रहते हुए भी विवेक, धैर्य और समत्व बनाए रखने की शिक्षा देते हैं। परिवर्तनशील संसार में स्थिरता बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण, आत्मबोध

( चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्,ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ ) में खोजनी चाहिए l

यह संसार स्वयं में एक अद्भुत रचना है, इस अद्भुत संसार में भारत एक विलक्षण स्थान रखता है। संसार की विविधता, रहस्य, सौन्दर्य और आध्यात्मिक गहराई का अनुभव भारतवर्ष के मनीषियों ने जितनी व्यापकता और सूक्ष्मता से किया है, वैसा उदाहरण विश्व के इतिहास में दुर्लभ है।


भारत परमात्मा की एक विशिष्ट कृति है। प्रकृति की समृद्धि, ऋषियों की ज्ञान-परम्परा, आध्यात्मिक चिन्तन, सांस्कृतिक वैभव और मानवीय मूल्यों का जो अद्भुत संगम यहाँ दिखाई देता है, वह इसे अनन्य बनाता है।

इसी भूमि में भगवान् राम का प्राकट्य हुआ।रामत्व  गुणों की अद्भुत समष्टि है जब मनुष्य संसार की परिवर्तनशीलता को समझकर सत्य, करुणा, मर्यादा, शक्ति और लोकहित के मार्ग पर चलता है, तब उसके जीवन में रामत्व का उदय होता है l 

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥130 ख॥


पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख क्यों हुआ, भैया शैलेन्द्र पांडेय जी की चर्चा क्यों हुई, बाल बुद्धि क्या है जानने के लिए सुनें l