16.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८२ वां* सार -संक्षेप

 इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥

आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥6


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८२ वां* सार -संक्षेप


स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लक्ष्मणपुरी 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६४


यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,

युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l


वर्तमान समय में निराशा, संशय, भय और अविश्वास का अंधकार व्याप्त है। ऐसे समय में हम स्वयं अपने भीतर ज्ञान, विवेक, साहस और आत्मविश्वास का दीपक प्रज्वलित करें l

हम जागरूक राष्ट्रभक्त समाज को दिशा देने का सामर्थ्य रखते हैं अतः हमें आलस्य और निष्क्रियता त्यागकर पुनः सक्रिय होने की आवश्यकता है। हम दृढ़ संकल्प के साथ कर्तव्य-पालन के लिए तैयार रहें  हम सोए हुए समाज को जगा दे, उसमें साहस, आत्मगौरव और नवचेतना का संचार कर देंl





हमारे भीतर स्थित चेतना ही हमारी वास्तविक शक्ति है। हम प्रयास करें कि हमारी चैतन्य-शक्ति सदैव जाग्रत और सक्रिय रहे , जिससे हम अपने विचारों, भावनाओं और आचरण पर सतर्क दृष्टि रख सकें । 


जाग्रत चेतना हमें व्यसनों और कुसंगति से दूर रहने की प्रेरणा देती है तथा हमें आत्मसंयम, सदाचार और विवेक के मार्ग पर अग्रसर करती है। ऐसी स्थिति में हम केवल अपने हित का ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण का भी विचार करते हैं । हम अपने जीवन को सत्कर्मों, सेवा, परोपकार, सत्य और धर्म के पालन से सार्थक बनाते हैं । इन हितकारी सदाचार वेलाओं का यही उद्देश्य है कि हम जाग्रत रहें अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखें l

यदि इन्द्रियों पर नियन्त्रण न रखा जाए, तो विषयासक्ति धीरे-धीरे मन को अपने वश में कर लेती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।


राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥ 21॥

राम - नाम  का जप महत्त्वपूर्ण है हम जप करें तो भगवान राम के कृत्यों पर भी ध्यान दें l तभी जप सार्थक है l

जिह्वा से श्रद्धापूर्वक किया गया राम-नाम का जप मनुष्य के अन्तःकरण को भी आलोकित करता है और उसके बाह्य जीवन को भी। भीतर का अज्ञान, भय, मोह, विकार और अशान्ति दूर होती है, तथा बाहर के व्यवहार में सदाचार, मधुरता, विवेक और धर्म का प्रकाश प्रकट होता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने रजत शर्मा का उल्लेख क्यों किया, भैया प्रदीप जी की चर्चा क्यों हुई  जानने के लिए सुनें l