राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥9॥
भगवान् भक्ति के स्रोत हैं, परन्तु उस भक्ति तक पहुँचाने वाले संत हैं; अतः सत्संग ही भगवद्भक्ति का प्रमुख साधन है।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७८३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६५
हम अनुभव करें कि हमारे भीतर भी शूरत्व,वीरत्व , त्याग , तप, भक्ति समाहित है l
जब-जब समाज पर अधर्म, अन्याय और स्वार्थ की छाया गहराती है, तब-तब लोकमंगल के लिए कोई न कोई अवतार उपस्थित हो जाता है। त्रेतायुग में भी दुष्टों की कमी नहीं थी। रावण और उसके समान अहंकार, अत्याचार तथा अधर्म की शक्तियाँ प्रबल थीं। तब भगवान् श्रीराम ने धर्म की स्थापना, सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश का संकल्प लिया।
कालांतर में भारतभूमि ने अनेक विषम परिस्थितियाँ देखीं हैं महाराणा प्रताप के काल में अकबर का शासन था राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान अनेक चुनौतियों से जूझ रहे थे। ऐसे संक्रमणकाल में गोस्वामी तुलसीदास ने राष्ट्र -भक्त समाज की व्यथा को केवल देखा ही नहीं, उसे अपने हृदय में अनुभव किया। उन्होंने समझ लिया कि किसी समाज की वास्तविक शक्ति उसके चरित्र, संस्कार और आत्मविश्वास में निहित होती है।
इसी भावना से उन्होंने रामचरितमानस की रचना की। मानस केवल एक काव्य नहीं, बल्कि जनमानस को जाग्रत करने वाला सांस्कृतिक उद्घोष है। उसने निराश समाज में आशा का दीप जलाया, बिखरे हुए जनसमुदाय को धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का स्मरण कराया तथा यह संदेश दिया कि संगठन, सदाचार और आत्मबल ही समाज की वास्तविक रक्षा कर सकते हैं।
तुलसीदास ने श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से जन-जन को यह शिक्षा दी कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि समाज अपने मूल्यों, संस्कृति और धर्म से जुड़ा रहे, तो उसका उत्थान निश्चित है। यही मानस का शाश्वत संदेश है और यही उसकी अमरता का आधार है l
तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य सच्चे हृदय, विनम्रता और प्रेम के साथ आध्यात्मिक सत्य की खोज करता है, उसे भक्ति रूपी अमूल्य मणि प्राप्त होती है। यह भक्ति ऐसी निधि है जिसमें संसार और परमार्थ—दोनों के कल्याण का सार समाहित है।
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा ll
निष्कपट भाव से खोजने वाला व्यक्ति भक्ति रूपी अमूल्य रत्न प्राप्त करता है। और जब भक्ति जागती है, तब अनुभव होता है कि भगवान् अपने भक्तों पर इतनी कृपा करते हैं कि भक्त का स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण हो जाता है। इसलिए संत-संग और भक्त-सेवा, भगवद्प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन हैं।
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