18.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८४ वां* सार -संक्षेप

 बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥122 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६६


प्रातःकाल शीघ्र जागें, संयमपूर्ण सात्विक आहार ग्रहण करें तथा उचित संगति का अवश्य ध्यान रखें । अपने मन के विकारों को निरन्तर घटाने का प्रयास करें। सामान्य मनुष्य के लिए समस्त विकारों का पूर्णतः अभाव हो जाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु उन्हें सूक्ष्म और नियंत्रित अवस्था में रखना सम्भव है। इसलिए मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए आत्मशुद्धि और आत्मसंयम की दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील रहें। अपनों की भावनाओं का सम्मान करें जिससे संगठन सुदृढ़ बन सके, भगवान राम के कार्यो को ध्यान में रखते हुए भगवान हनुमान के समान निष्ठा, बल, विनय, सेवा-भाव और साधना हमें भी प्राप्त हो— ऐसी मंगलकामना करें।



सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति में स्वयं को प्रस्तुत करने, अपनी बात कहने और अपनी पहचान बनाने की इच्छा होती है। यह स्वाभाविक है। किन्तु जब ध्यान केवल स्वयं पर ही केन्द्रित रह जाता है और अपने सजातीय राष्ट्रभक्त जनों को जानने, समझने तथा उनके सुख-दुःख में सहभागी बनने की भावना नहीं रहती, तब तक प्रभावशाली संगठन का निर्माण नहीं हो पाता।

संगठन का आधार “मैं” नहीं, अपितु “हम” की भावना है।

जब हम अपने अतिरिक्त अपनों को भी जानेंगे , उनके गुणों, आवश्यकताओं, अनुभवों और भावनाओं का सम्मान करेंगे , तभी परस्पर विश्वास, सहयोग और आत्मीयता का वातावरण बनेगा l यही किसी सशक्त और जीवंत संगठन की वास्तविक नींव है। आचार्य जी युगभारती का यही स्वरूप चाहते हैं  युगभारती इस कारण आवश्यक है क्योंकि समाज का वह वर्ग जो राष्ट्र के हित, संस्कृति और मूल्यों के प्रति निष्ठावान है, वर्तमान परिस्थितियों में अनेक प्रकार की आशंकाओं, भ्रांतियों और अनिश्चितताओं का अनुभव कर रहा है। वह आशा और विश्वास के साथ हमारी ओर देख रहा है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम अपने ज्ञान, आचरण, संगठन-शक्ति और आत्मविश्वास के द्वारा उसके मन में स्पष्टता, साहस और विश्वास का संचार कर सकें l


भैया विजय दीक्षित जी की अखंड साधना का विशेष उल्लेख क्यों हुआ, भैया मुकेश जी की चर्चा क्यों हुई, शिक्षा -संग्रह पुस्तक का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया, अधिवेशन की सफलता किस कारण संभव है जानने के लिए सुनें l