19.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६७


हम प्रयास करें कि हमारा शरीर इतना स्वस्थ, हल्का और स्फूर्तिमय रहे कि वह हमारे उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक बन सके। शरीर भोग का साधन नहीं, साधना का साधन है। जब वह संयम, उचित आहार और नियमित परिश्रम से संतुलित रहता है, तब वह धर्म, कर्तव्य, सेवा और आत्मविकास के मार्ग में समर्थ सहयोगी बन जाता है।



श्रीरामचरितमानस केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु हमारे जीवन का आश्रय , शक्ति, संजीवनी तथा सत्कर्मों की प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। यह लोकमंगल की भावना से रचित ऐसी अमूल्य निधि है, जिसने असंख्य व्यक्तियों को निराशा में आशा, दुर्बलता में सामर्थ्य और भ्रम में मार्गदर्शन प्रदान किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जब इस निधि की रचना कर रहे थे, तब वे  समाज के लिए अपरिचित  नहीं थे। वे विद्वान् कथावाचक के रूप में दूर-दूर तक विख्यात हो चुके थे। उन्हें 'गोस्वामी' की सम्मानित पदवी प्राप्त थी और समाज में उनका आदर था। व्यक्तिगत यश, प्रतिष्ठा और सम्मान की दृष्टि से उन्हें किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं थी।

तथापि उनके संवेदनशील हृदय में अपने समाज और राष्ट्र के प्रति गहरी वेदना विद्यमान थी। उन्होंने देखा कि जनसामान्य भय, भ्रम, निराशा और आत्मविस्मृति के वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहा है। अकबर के कुशासन के प्रभाव से लोगों का आत्मविश्वास क्षीण हो रहा है , सामाजिक एकता दुर्बल पड़ रही है और अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति श्रद्धा भी डगमगाने लगी है ।

ऐसे समय में तुलसीदास ने लोकभाषा में रामचरितमानस की रचना करके जनमानस में आत्मबल, धर्मनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और सांस्कृतिक गौरव का पुनर्जागरण किया। उनके लिए यह केवल काव्य-रचना नहीं थी, बल्कि समाज के भय और भ्रम को दूर करने का एक महायज्ञ था। रामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने जन-जन को यह विश्वास दिलाया कि धर्म, सत्य, साहस और मर्यादा की शक्ति किसी भी विपरीत परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकती है


सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥


भगवान श्रीराम, जिनके जन्म के अनेक कारण हैं और जिनमें सर्वाधिक प्रमुख कारण धर्म की रक्षा और सज्जनों की पीड़ा का निवारण है,के गुणों का श्रद्धापूर्वक श्रवण और मनन जीवन का परम कल्याणकारी साधन है। यह मनुष्य के भीतर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करता है कि वह संसार के भय, मोह और दुःखों को पार कर लेता है, मानो बिना नौका के ही महासागर पार कर गया हो।भगवान् राम दुष्टों के वध के लिए सदैव सन्नद्ध रहे l 

इसके अतिरिक्त हरिशंकर  शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ,प्रश्नोत्तर मणिमाला की चर्चा करते हुए आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l