प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७८६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६८
अपने सनातन धर्म पर विश्वास करें, क्योंकि यह केवल एक उपासना-पद्धति नहीं, अपितु जीवन जीने की एक समग्र और शाश्वत दृष्टि है। आइए, हम अपने आचरण, संस्कार और कर्तव्यनिष्ठ जीवन के माध्यम से इस गौरवशाली परम्परा को समझें, अपनाएँ और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ
दुर्भाग्यवश हमारी विकृत एवं औपनिवेशिक शिक्षा-पद्धति के प्रभाव से भारतीय ग्रन्थों के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ फैलाई गईं। उन्हें केवल कल्पना, अन्धविश्वास अथवा असंगत कथाओं का संग्रह मान लिया गया, जबकि वास्तव में वे भारतीय संस्कृति, जीवन-मूल्यों और सनातन परम्परा के अक्षय भण्डार हैं।
पौराणिक आख्यान तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों में वर्णित कथाएँ केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण नहीं हैं; वे भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और सनातन जीवन-दृष्टि की अमरता के आलंकारिक, प्रतीकात्मक और दार्शनिक निरूपण हैं। उनमें निहित पात्र, घटनाएँ और प्रसंग मानव-स्वभाव, नैतिक संघर्ष, आध्यात्मिक साधना तथा सार्वकालिक सत्यों के गूढ़ संकेतक हैं। उदाहरणार्थ पद्मपुराण में पाताल खंड में भगवान् श्रीराम का वर्णन है l हमें इनका अध्ययन करने के लिए अपने मन को केन्द्रित करते हुए भावों विचारों के स्थैर्य के साथ अपना कुछ समय निर्धारित करना चाहिए l
गोस्वामी तुलसीदास, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सेवा,साधना, रामात्मक संगठन में नियोजित किया,ने श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के वैकुण्ठगमन का वर्णन नहीं किया। उनका उद्देश्य ऐसे आदर्श पुरुषोत्तम भगवान राम का चरित्र समाज के समक्ष रखना था, जो धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, लोकमंगल और राष्ट्रधर्म की प्रेरणा दे सके। क्योंकि तुलसीदास ऐसे काल में प्रकट हुए जब समाज राजनीतिक पराधीनता, सांस्कृतिक विघटन और आत्मविस्मृति से ग्रस्त था। उन्होंने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास, धर्मनिष्ठा, सदाचार और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण करने का प्रयत्न किया।
असंख्य आक्रमणों, विपत्तियों और चुनौतियों के उपरान्त भी भारतभूमि, भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म अक्षुण्ण बने हुए हैं। भारतभूमि, भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए युग-युगांतर से अनेक संतों, महापुरुषों और संगठनों ने कार्य किया है। आधुनिक काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी समाज-संगठन, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान देने का प्रयास किया है।
इसके अतिरिक्त भैया पवन जी,भैया सौरभ द्विवेदी की चर्चा क्यों हुई, दीनदयाल विद्यालय में लोगों ने क्या देखा, रामजन्मभूमि का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l