त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७८९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७१
सफलता की कामना करें किन्तु साधना में रत रहें
समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करें
जो जहाँ है, वहीं आत्मबोध, आत्मचिन्तन और आत्मजागरण का प्रयास करे। अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने तथा यह स्मरण रखे कि हमारा जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और स्वार्थों की पूर्ति के लिए नहीं है। हम इस राष्ट्र की चेतना के जीवंत प्रतिनिधि हैं। इसी आधार पर हम कहते हैं वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l
यदि भारत माता हमारे लिए वन्दनीया, पूजनीया और आराध्या हैं , तो उनके समक्ष उपस्थित संकटों, चुनौतियों और कष्टों को दूर करने का प्रयत्न करना हमारा पवित्र कर्तव्य है। जो शक्तियाँ राष्ट्र, संस्कृति और समाज के प्रति द्वेष का भाव रखती हैं, उनका विवेकपूर्ण और दृढ़ प्रतिकार करना भी हमारा दायित्व है। हमें समाज में छिपे उन कालनेमियों को पहचानते रहना चाहिए जो कल्याण के मार्ग में बाधक हैं और लोकमंगल के कार्यों में विघ्न उपस्थित करते हैं।
हमें दीपक के समान निरन्तर जलते रहना है। स्वयं तपकर भी दूसरों को प्रकाश देना, निराशा में आशा का संचार करना, अज्ञान में ज्ञान का दीप प्रज्वलित करना तथा समाज में सद्भाव, जागरण और पुरुषार्थ का प्रकाश प्रसरित करना ही साधना का दिव्य स्वरूप है।
हम सफलता की कामना अवश्य करते हैं, किन्तु हमारा विश्वास केवल सफलता में नहीं, बल्कि सतत् साधना में है। हम विश्राम, प्रमाद और निराशा को अपने जीवन में स्थान नहीं देंगे। सिद्धि की प्राप्ति हेतु आजीवन पुरुषार्थरत रहेंगे तथा प्रत्येक परिस्थिति में अपने कर्तव्य-पथ पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहेंगे।
हमारा प्रयत्न व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र के सुदृढ़ एवं आत्मीय संयोजन का होगा। हम एकात्म मानव-दर्शन के उस आदर्श को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे, जिसमें सम्पूर्ण समाज को एक ही विराट् चेतना का अभिन्न अंग माना गया है। किन्तु इतना ध्यान अवश्य रखना है राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज ही हमारा अंग है l यह बोध उचित शिक्षा से ही संभव है l
शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जन या धनोपार्जन नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो मनुष्य को स्वावलम्बी बनाए, उसके भीतर आत्मविश्वास जाग्रत करे, उसके चरित्र को दृढ़ बनाए,उसके जीवन में भक्ति, संवेदना और कर्तव्यनिष्ठा का संचार करे तथा उसे समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाए।
शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया है।
शिक्षा ऐसी हो जो रामत्व की अनुभूति कराए भगवान राम ने अपनी भुजा उठाकर प्रतिज्ञा की कि पृथ्वी को निशाचरों के अत्याचारों से मुक्त करेंगे। यह अधर्म, अन्याय, अत्याचार और भय के उन्मूलन का उद्घोष था। शिक्षा ऐसी हो जो हमें उच्च लक्ष्य निर्धारित करने का साहस दे , उसके लिए निरन्तर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दे विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की शक्ति दे तथा धर्म और लोकमंगल के लिए जीवन समर्पित की भावना प्रदान करे ।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विवेक सचान जी, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पवन मिश्र जी का उल्लेख क्यों किया, मैहर किसे कहते हैं, तुलसीदास जी का क्या कौशल था,जानने के लिए सुनें l