24.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९० वां* सार

 शिक्षा स्वरूप के सहित स्वात्म का दर्शन है,

सभ्यता व्यवस्था-युत सौन्दर्य प्रदर्शन है, 

शिक्षा भुजबल के साथ आत्मबल का हुलास, 

वह समय पड़े पर प्रखर बुद्धिबल का विलास ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७२

हमारा पौरुष, विवेक, पुरुषार्थ जाग्रत रहे हम जीवन भर सन्मार्ग से भटकें नहीं इसके लिए हर संभव प्रयास करें l देश और समाज के महत्त्व को समझते हुए कर्मरत रहें l संगठन के भाव को प्रबल रखते हुए संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहें l 



यद्यपि विकृत एवं पराधीन मानसिकता से प्रेरित शिक्षा-व्यवस्था द्वारा हमें अपने साहित्य, अपनी ज्ञान-परम्परा, अपनी मातृभूमि तथा अपनी भाषा से विमुख करने का प्रयास किया गया  तथापि हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को अपने आर्ष साहित्य, अपनी ज्ञान-परम्परा, अपने पराक्रम और शौर्य, अपनी पावन धरा तथा अपनी मातृभाषा के प्रति गहन श्रद्धा, आदर और भक्ति का भाव रखना चाहिए।

ये अमूल्य धरोहरें हमारे व्यक्तित्व को संस्कारित करती हैं, हमारी पहचान को सुरक्षित रखती हैं तथा हमें अपने गौरवशाली विलक्षण अतीत से जोड़कर भविष्य के लिए दिशा प्रदान करती हैं।

जब हमें अपने साहित्य पर गर्व होता है, अपने ज्ञान पर विश्वास होता है, अपनी भूमि से आत्मीयता होती है और अपनी भाषा से प्रेम होता है, तब हम आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के साथ आगे बढ़ते हैं । अतः हमें अपनी इस अमूल्य विरासत का जिसके आधार पर हम कभी विश्वगुरु कहलाए,केवल सम्मान ही नहीं करना चाहिए, अपितु उसे आत्मसात् कर उसके संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार का भी सतत प्रयास करना चाहिए। भावी पीढ़ी को भी इस ओर उन्मुख करने का प्रयत्न करना चाहिए l

श्री रामचरितमानस भारतीय साहित्य, संस्कृति और भक्ति परम्परा का एक अनुपम महाकाव्य है इससे हम जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएँ ग्रहण कर सकते हैं। यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं, अपितु मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का मार्गदर्शन करने वाला लोकमंगलकारी ग्रंथ है। 

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं सेतु बन चुका है 

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥

उस अद्भुत दृश्य और कौतुक को देखकर दोनों भाई— श्रीराम और लक्ष्मण— मुस्कराए। करुणामूर्ति रघुनाथजी फिर अपनी सेना सहित आगे बढ़े। उनके साथ असंख्य वानर-वीरों और यूथपतियों (वानर-सेनापतियों) की ऐसी विशाल भीड़ थी कि उसका वर्णन करना भी सम्भव नहीं है।

यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान् श्रीराम की सहज, धैर्यपूर्ण और प्रसन्नचित्त वृत्ति का चित्रण करते हैं। युद्ध जैसे गंभीर अवसर पर भी श्रीराम विचलित नहीं होते, अपितु परिस्थिति को देखकर मुस्करा देते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महान नेतृत्व विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, प्रसन्नता और आत्मविश्वास बनाए रखता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पवन जी, भैया अरविन्द जी, भैया गोपाल जी, गोपाल पाठा, प्रदीप सिंह  का उल्लेख क्यों किया, आचार्य जी ने तैत्तिरीयोपनिषद् की वल्लियों के विषय में क्या बताया   जानने के लिए सुनें