25.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९१ वां* सार -संक्षेप

 बंदउँ संत असज्जन चरना।

दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं।

मिलत एक दुख दारून देहीं॥

गोस्वामी तुलसीदास जी ने अत्यन्त सूक्ष्म विनोदपूर्ण शैली में संत और असंत दोनों का उल्लेख किया है। संतों का संग सुख, शान्ति और कल्याण प्रदान करता है, इसलिए उनसे वियोग असह्य लगता है। दूसरी ओर दुष्टों का संग आरम्भ से ही कष्ट, अशान्ति और दुःख का कारण बनता है। इस प्रकार दोनों दुःखदायी हैं, किन्तु एक का वियोग दुःख देता है तो दूसरे का संयोग।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी ( निर्जला एकादशी ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७३

अपनी दृष्टि से  समाज और राष्ट्र के कल्याणार्थ अपनी सृष्टि निर्मित करें 


आचार्य जी जीवन को दिशा देने वाले गुरु-स्वरूप श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य अद्वितीय मार्गदर्शक ग्रन्थों के आधार पर प्रतिदिन हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं, जिससे हम जीवन में कभी निराश, हताश या व्यथित न हों। हम सदैव अपनी सोच सकारात्मक रखें l हम शक्ति पराक्रम की अनुभूति कर सकें l वे हमें बाह्य परिस्थितियों और दूसरों के आचरण पर ध्यान केन्द्रित करने के स्थान पर आत्मदर्शन की ओर उन्मुख करते हैं। यदि हम स्वयं को देखना और समझना प्रारम्भ कर दें , तो हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

'दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं'—इस चिन्ता में समय नष्ट करने की अपेक्षा हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारे लिए तो कार्य के अनेक क्षेत्र खुले हुए हैं। हम वहां ध्यान दें l समाज, राष्ट्र और संस्कृति की सेवा के अनगिनत अवसर हमारे सामने हैं। अतः हमें निरन्तर कर्मरत रहते हुए अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥


मोहांध और कामान्ध रावण के विवेक पर ऐसा आवरण पड़ गया था कि समुद्र पर बने श्रीरामसेतु जैसे अभूतपूर्व कार्य को भी वह तुच्छ समझता रहा।

जब रावण अपनी हार की चिंता भुलाकर महल लौटा, तब रानी मंदोदरी ने अपने पति रावण के चरण पकड़कर अत्यंत विनम्रता और विवेक के साथ यह विनती की

कि भगवान् राम से बैर न करें 


नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥

तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥


रात्रि में जुगनू का प्रकाश कुछ दिखाई देता है, परन्तु सूर्य के उदय होते ही उसका अस्तित्व ही नहीं रह जाता। उसी प्रकार रावण का बल संसार को बड़ा प्रतीत हो सकता है, किन्तु श्रीराम की दिव्य शक्ति के सम्मुख वह नगण्य है।


इसके अतिरिक्त सात्विक पत्नी के निर्देशों की अवहेलना करने पर क्या होता है, फेसी क्या है, उच्चारण का शास्त्र क्या है जानने के लिए सुनें