26.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९२ वां* सार -संक्षेप

 समस्त जीव मात्र का बस एक मित्र है, 

कि सच कहूँ मनुष्य सिर्फ शिव चरित्र है, 

मनुष्य का विकास दिव्य देव से बड़ा, 

मनुष्य जग जहान के लिए सदा खड़ा,....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७४

धर्माधारित जीवन अपनाएं क्योंकि यह किसी का अनिष्ट नहीं करता l इसी के अनुसार अपने कार्यों को संशोधित करें l देश और समाज के हित के कार्य अवश्य करें l



आज समाज में जो नैतिक पतन, भ्रष्टाचार, हिंसा, पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन और सामाजिक असंतुलन दिखाई देता है, उसका मूल कारण शिक्षा की दिशा और स्वरूप है। यदि शिक्षा केवल आजीविका का साधन बनकर रह जाए और चरित्र, संस्कार, कर्तव्यबोध तथा राष्ट्रभाव का निर्माण न करे, तो वही शिक्षा अनेक समस्याओं को जन्म देती है। मैकाले द्वारा थोपी गयी यही शिक्षा इस समय चल रही है इसके विपरीत यदि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास हो—उसमें ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विज्ञान के साथ मानवीय मूल्य भी हों जैसी हमारी वैदिक शिक्षा थी तो वही शिक्षा सभी समस्याओं का स्थायी समाधान बन जाती है।

इसीलिए शिक्षा को केवल प्रशासनिक विषय न मानकर राष्ट्र-निर्माण का विषय समझना होगा। शिक्षा-नीति के निर्माण और संचालन में शिक्षाविदों, आचार्यों तथा शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घ अनुभव रखने वाले व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। शिक्षा की दिशा और स्वरूप का निर्धारण मुख्यतः शिक्षा-जगत के अनुभवी मनीषियों के हाथों में होना चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास ने शिक्षा को केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि जीवन-निर्माण का साधन माना l उनके समय में समाज निराशा, विभाजन, नैतिक पतन और सांस्कृतिक संकट से जूझ रहा था क्योंकि अकबर का शासन था l श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने पूरे समाज को धर्म, कर्तव्य, मर्यादा, सेवा और आदर्श जीवन का पाठ पढ़ाया और जाग्रत करने का प्रयास किया ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान् राम विषम परिस्थितियों में धर्म, विवेक, साहस और कर्तव्य के साथ खड़े रहे l

 आजीवन भोग का भोगी कामान्ध रावण व्याकुल है किन्तु अपनी व्याकुलता प्रदर्शित नहीं कर रहा है मन्दोदरी से वह प्रेम करता है किन्तु उससे भयभीत भी रहता है इस कारण उसका असम्मान कभी नहीं करता l 


रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥

श्रीसीताजी सहित भगवान श्रीराम के चरणकमलों में अपना मस्तक झुकाकर सब कुछ उन्हें समर्पित कर दीजिए। तत्पश्चात अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में जाकर भगवान श्रीरघुनाथ का भजन कीजिए।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों किया, प्रहस्त ने रावण से क्या कहा,बाँस के रोग "घमोई" की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l