प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७९३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७५
हम सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास करें उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की महत्ता से अवगत कराएं l
शिक्षा हमारे सनातन धर्म का एक अद्भुत एवं जीवन-निर्माणकारी संस्कार है। हमारे शास्त्रों में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक मानव-जीवन को पवित्र और परिष्कृत बनाने के लिए विविध संस्कारों का विधान किया गया है। इन सभी संस्कारों में शिक्षा का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है l शिक्षा केवल ज्ञानार्जन और जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं, अपितु साधना भी है और सिद्धि भी। वह हमारे भीतर संस्कारों का बीजारोपण करती है, श्रेष्ठ विचारों का विकास करती है तथा हमारे व्यक्तित्व को संयम, अनुशासन और सदाचार की दिशा में प्रेरित करती है। शिक्षा हमारे अंतःकरण में सात्त्विक शक्ति का जागरण कर हमें लोकमंगल के पथ पर अग्रसर करती है। सौभाग्य से हमें इस महान शिक्षा-परम्परा का जो कुछ भी अंश दीनदयाल विद्यालय से प्राप्त हुआ है, उसी के आधार पर हम राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को शिक्षा के इस वास्तविक स्वरूप का अनुभव कराएं l समाज यह समझे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास और राष्ट्र-निर्माण है।
यही वह शिक्षा थी जो हमारे प्राचीन गुरुकुलों में प्रदान की जाती थी—जहाँ विद्या के साथ विनय, ज्ञान के साथ आचरण और बौद्धिक विकास के साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान का भी समन्वय होता था।
सन्त, विचारक, ध्यानी, ज्ञानी, समाजसेवी,चिन्तक, आंदोलनकर्ता, विद्वान, स्वामी दयानन्द के अनुयायी तथा सनातन धर्म के पोषक स्वामी श्रद्धानन्द जिनका जन्म मुंशी राम विज के रूप में हुआ था ,द्वारा सन् १९०२ में स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार आज भी भारतीय गुरुकुल परम्परा की गौरवशाली शिक्षा-पद्धति को जीवंत रखते हुए वैदिक संस्कृति, भारतीय दर्शन तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के समन्वित शिक्षण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है l गोस्वामी तुलसीदास जी ने शिक्षा, संस्कार और लोकजागरण का महान कार्य श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। उन्होंने सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास किया। आइए, हम भी उसी लोकमंगलकारी ग्रन्थ जो भक्ति के साथ शक्ति की भी अनुभूति कराता है श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रवेश करें और उसके दिव्य संदेशों का श्रवण कर अपने जीवन को आलोकित करें।
इस समय हम लंका कांड में प्रविष्ट हैं
प्रहस्त रावण के चरण पकड़कर विनम्रतापूर्वक कहता है—
नाथ चरन गहि कहउँ दससीसा।
सुनहु बचन मम परिहरि दीसा॥
जेहि देखेँ कुसल जाहि तोरी।
सो सीता देहु, करहु पुनि प्रीती॥
"हे नाथ! हे दशानन! मेरे वचनों को हितकर समझकर सुनिए। जिस उपाय से आपका कल्याण हो, वही कीजिए। सीताजी को श्रीराम को लौटा दीजिए और उनसे पुनः मैत्री स्थापित कर लीजिए।"
और उधर समुद्र पर सेतु बाँधकर लंका पहुँचने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने लंका के समीप स्थित सुबेल पर्वत पर अपनी सेना के साथ पड़ाव डाल रखा है । वहीं से लंका का निरीक्षण हो रहा है और आगे की युद्ध-रणनीति बनाई जा रही है । यही वह स्थान है जहाँ विभीषण, सुग्रीव, हनुमान जी आदि के साथ युद्ध-संबंधी मंत्रणा चल रही है l
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l