अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।
रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ 13 (ख)॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७९४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७६
सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों को विस्मृत या उपेक्षित न करें l सनातन धर्म अद्भुत है l
शिक्षा का आधार त्याग है अतः शिक्षा को व्यवसाय बना देना उसकी गरिमा और उद्देश्य—दोनों के प्रतिकूल है।
यह हमारा सौभाग्य है कि आचार्य जी इन गम्भीर तात्त्विक एवं सदाचार-प्रेरक प्रवचनों के माध्यम से हमें सद्विचारों को आत्मसात् करने, उत्साह और प्रफुल्लता के साथ राष्ट्र तथा समाज के कल्याण में प्रवृत्त होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। साथ ही वे अद्भुत सनातन धर्म की दिव्य परम्परा तथा विविधताओं में एकता से अनुप्राणित भारत की अद्भुत सांस्कृतिक महिमा का भी साक्षात्कार कराते हैं।रावणत्व आज भी समाज में विद्यमान है। इसलिए हम प्रतिवर्ष रावण-दहन कर उसके अहंकार, अधर्म, अन्याय और दुराचार के प्रतीक स्वरूप का परित्याग करने का संकल्प लेते हैं। यही सनातन धर्म की समन्वयवादी दृष्टि है। सनातन धर्म किसी व्यक्ति के प्रति द्वेष नहीं, अपितु उसके दुर्गुणों के परित्याग का संदेश देता है। जो व्यक्ति भयानक भौतिकवादी रावण की पूजा या महिमा का भाव रखता है, वह वस्तुतः उसके दोषों अहंकार, दम्भ, स्वेच्छाचार और अधर्म को अपने भीतर स्थान दे रहा होता है।किन्तु हमारा लक्ष्य दुर्गुणों का उन्मूलन और सद्गुणों का विकास है। तो आइये प्रवेश करें सद्गुणों को आत्मसात् करने के लिए श्रीरामचरित मानस में
समुद्र पर सेतु निर्माण के उपरान्त भगवान श्रीराम अपनी वानर-सेना सहित सुवेल पर पहुँचे हैं रावण के साथ युद्ध करने की स्थितियां बन रही हैं l
छत्र मुकुट तांटक तब हते एकहीं बान।
सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ 13 (क)॥
सुवेल पर्वत पर स्थित भगवान श्रीराम ने एक ही बाण से रावण का छत्र, उसका मुकुट तथा मन्दोदरी के ताटङ्क (कर्णाभूषण) काट गिराए। यह सब सबके देखते-देखते हुआ, किन्तु यह रहस्य कोई भी नहीं समझ सका कि यह कैसे हुआ।
यह घटना केवल भगवान श्रीराम के अद्भुत धनुर्विद्या-कौशल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि एक मौन चेतावनी भी है। भगवान बिना युद्ध आरम्भ किए ही रावण को यह संकेत देते हैं कि यदि वे चाहें तो एक ही बाण में उसका अन्त कर सकते हैं।तथापि वे उसे सुधरने और धर्म का आश्रय लेने का अवसर देते हैं। यह श्रीराम की शक्ति के साथ-साथ उनकी मर्यादा, धैर्य और करुणा का भी परिचायक है।
इसके अतिरिक्त श्री चुन्नीलाल कुरील के साथ 'रावण और उसकी लंका' पुस्तक की चर्चा क्यों हुई राधामाधव चिन्तन पुस्तक का उल्लेख क्यों हुआ भैया आशीष जोग का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया जानने के लिए सुनें