रामं भजन्ति निपुणा मनसा वचसाऽनिशम्।
अनायासेन संसारं तीर्त्वा यान्ति हरेः पदम्॥
"जो विवेकी, तत्त्वज्ञ और कुशल साधक निरन्तर मन से तथा वाणी से भगवान श्रीराम का भजन करते हैं, वे सहज ही इस जन्म-मरणरूपी संसार-सागर को पार करके भगवान हरि के परम पद (मोक्ष) को प्राप्त हो जाते हैं।"
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७९५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७७
हम रामात्मक भाव लेकर सांसारिक कर्मों में लिप्त हों अर्थात् अपने विचार, वाणी और आचरण में भगवान श्रीराम के गुणों को धारण करें जब हम इस भाव के साथ अपने पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक तथा राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करेंगे तब हमारे कर्म धर्ममय और लोककल्याणकारी बन जाएंगे l
संसार में रहकर कर्म करना हमारा स्वाभाविक कर्तव्य है किन्तु उन कर्मों के पीछे यदि स्वार्थ, अहंकार और आसक्ति के स्थान पर मर्यादा, सत्यनिष्ठा, सेवा, करुणा और कर्तव्यपरायणता का भाव हो, तो वही रामात्मक भाव है।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
लंका कांड में एक प्रसंग उस समय का है जब मंदोदरी अपने पति रावण को समझा रही हैं।
सजल नयन कह जुग कर जोरी।सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥कंत राम बिरोध परिहरहू।जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥
मन्दोदरी अश्रुपूर्ण नेत्रों से हाथ जोड़कर कहती हैं—"हे मेरे प्राणप्रिय स्वामी! मेरी विनती सुनिए। श्रीराम से वैर त्याग दीजिए। उन्हें केवल साधारण मनुष्य समझकर अपने मन में हठ मत कीजिए। वे साधारण मानव नहीं, परम दिव्य शक्ति हैं।"
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ 14॥
भगवान श्रीराम सीमित मानवीय देह में प्रकट होकर भी अनन्त, सर्वव्यापक और विश्वस्वरूप परमात्मा हैं। उनका अवतार केवल मानव-लीला है; वास्तविक स्वरूप समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
मन्दोदरी गीता क्या है तुलसीदास जी ने चौपाई
"सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥" कहां से प्रेरित होकर लिखी,खलनायक प्रायः शास्त्रवचन नहीं कहता इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया, साहस शब्द का अर्थोत्कर्ष न होता तो वास्तव में इसका क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें l